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सम्पादकीय: युद्ध नहीं, विवेक की ज़रूरत है – गोदी मीडिया की बकवास और फेक न्यूज़ पर सवाल जरूरी

Ajay kumar suraj 18 May 2025 आलेख दुःखद #सम्पादकीय #युद्ध_नहीं,_विवेक_की_ज़रूरत_है # गोदी_मीडिया #फेक_न्यूज़ 24386 0 Hindi :: हिंदी

सम्पादकीय: युद्ध नहीं, विवेक की ज़रूरत है – गोदी मीडिया की बकवास और फेक न्यूज़ पर सवाल जरूरी

हर बार जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है, तब देश का एक बड़ा तबका सच्चाई और ज़िम्मेदारी की अपेक्षा करता है। पर अफ़सोस की बात यह है कि भारत का एक हिस्सा, जिसे आज "गोदी मीडिया" कहा जाता है, हर बार देशभक्ति के नाम पर झूठ, सनसनी और अफ़वाहें परोसने में लग जाता है। युद्ध जैसी गंभीर स्थिति में जनता को सच्चाई बताने के बजाय यह मीडिया टीआरपी की दौड़ में अंधा हो जाता है।

युद्ध को ‘थ्रिल’ बनाता मीडिया
भारत-पाक युद्ध या सीमाई झड़पों के दौरान टीवी चैनलों पर बहसें नहीं, ‘तमाशा’ चलता है। एंकर सैनिकों की भूमिका निभाने लगते हैं, स्टूडियो युद्धभूमि बन जाता है, और चीख-चीखकर राष्ट्रभक्ति के नाम पर जनता की भावनाएं भड़काई जाती हैं। सवाल यह है कि क्या मीडिया का काम यही है? क्या युद्ध को उत्सव की तरह पेश करना पत्रकारिता है?

फेक न्यूज़: एक खतरनाक औजार
कई बार देखा गया है कि ऐसे तनावपूर्ण माहौल में बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के झूठी खबरें चलाई जाती हैं—जैसे कि "300 आतंकवादी मारे गए", "पाकिस्तान के 5 F-16 गिरा दिए गए", "हमने दुश्मन की राजधानी हिला दी", आदि। जब बाद में सच्चाई सामने आती है, तो गोदी मीडिया चुप हो जाता है या झूठ के ऊपर एक और परत चढ़ा देता है।

यह फेक न्यूज़ न सिर्फ जनता को गुमराह करती है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और कूटनीतिक स्थिति को भी नुकसान पहुंचाती है। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आम नागरिक, खासकर युवा, आक्रोशित और कट्टर हो जाते हैं।

सरकार की गोद में बैठा मीडिया
‘गोदी मीडिया’ शब्द यूं ही नहीं आया। जब पत्रकारिता सत्ता से सवाल करना छोड़ दे, और शासकों की जय-जयकार करने लगे, तो वो चौथा स्तंभ नहीं रहता – वो प्रचारतंत्र बन जाता है। युद्ध की स्थिति में जब सवाल पूछने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है—कि सैनिकों को पर्याप्त संसाधन मिल रहे हैं या नहीं, कूटनीति क्यों विफल रही, युद्ध का असर अर्थव्यवस्था पर क्या होगा—तब गोदी मीडिया सिर्फ एकतरफा ‘राष्ट्रवाद’ बेच रहा होता है।

जिम्मेदार पत्रकारिता की ज़रूरत
देशभक्ति और पत्रकारिता में फर्क होता है। एक सच्चा पत्रकार देश के हित में सच बोलता है, भले ही वो सत्ता के खिलाफ हो। फेक न्यूज़ और उकसाऊ कवरेज से न देश को ताकत मिलती है, न सैनिकों का सम्मान बढ़ता है। देश को जरूरत है ऐसे मीडिया की जो निडर होकर सत्ता से सवाल करे, जो युद्ध की विभीषिका को समझे और शांति की राह दिखाए।

निष्कर्ष
भारत-पाक


तनाव कोई टीआरपी का साधन नहीं है। यह मानव जीवन, राष्ट्रीय संसाधन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा मामला है। मीडिया का कर्तव्य है कि वह विवेक से काम ले, ज़िम्मेदारी निभाए और सच को सामने लाए। गोदी मीडिया की बकवास और झूठी खबरों की दुकान बंद होनी चाहिए—वरना यह लोकतंत्र और देश दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
   
                                                                       समझना या न समझाना आपकी बुद्धि पर निर्भर है ,किसी को बुरा लगे तो क्षमा प्रार्थी है 

                                                                               अजय कुमार 'सूरज'

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