Pinky Kumari 30 Mar 2023 आलेख धार्मिक 54311 0 Hindi :: हिंदी
शरीर से चिपकना और अपनी काम वासना को पुरा करना प्रेम नहीं है। और नहीं प्रेम किसी एक व्यक्ति के लिये या एक व्यक्ति के द्वरा किया जाने वाला प्रेम नहीं बल्की का व्यक्ति का स्वार्थ छिपा होता है। कामना छिपी होती है। अगर व्यक्ति को काम वासन नहीं मिले तो व्यक्ति एक मछली की भाती तड़पता रहता है।स्त्री और पुरुष का शरीर से चिपकना प्रेम नहीं है। ना जाने कुछ लोग या में कहुँ कि आज कल के युवा काम वासना को हो प्रेम समझ बेटे है। प्रेम को एक गन्दी प्ररिभाषा देदी गयी है। आज कल के युवाओं के द्वारा में सिधे - सिधे शब्दों में कहुँ तो में काम वासना की बात नहीं करूगी में बात करूगी प्रेम कि प्रेम वो नहीं जिसमें लेन देन छिपा हो जिसमें हर वस्तु को लेकर हर जिव जन्तु को लेकर स्वार्थ छिपा हो वो प्रेम नहीं होता अपितु प्रेम एक विशाल समुद् कि भाती होता है। जिसमें अच्छे बुरे सब अपने अन्दर समा लेने कि शक्ति होती है और फिर भी शान्त रहे वो है प्रेम जैसे एक माँ का अपने बच्चे को लेकर प्रेम होता है। निश्चल निस्वार्थ प्रेम छिपा होता है। वो है प्रेम जो दिखावा ना करे वो है। प्रेम जिसमें ना लेना ना देना वो है। प्रेम देना प्रेम है। लेना प्रेम नहीं अपितु स्वार्थ होता है। लेना। जैसे एक भगत का भगवान के प्रति और एक भगवान का भगत के प्रति जो रिश्ता होता है। वो है प्रेम जैसे हनुमान का श्री राम के प्रति वो है। प्रेम जैसे सुदामा का श्री कृष्ण के प्रति और श्री कृष्ण का सुदामा के प्रति वो है प्रेम विश्चछ और विस्वार्थ जो दुसरो के दुःख को अपना दुःख समझकर समाधान करे वो है प्रेम सभी जिव जन्तुओं के प्रति दया करुणा का भाव रखें वो है। प्रेम जिस इंसान में ईशा, राग , द्वेष , जलन, स्वार्थ लड़ाई, झगड़े आदि का भाव ना हो वो है प्रेम I प्रेम में ना किसी का लेना ना किसी का देना ना किसी को खोने का डर हो और नाहीं किसी को पाने कि लालसा वो है प्रेम ना मरने का डर ना ही जिने की खुशी वो है प्रेम । प्रेम के बारे में में कुछ कहुँ मुझमें इतना सामर्थ्य नहीं में अज्ञानी हुँ मुझमें इतना ज्ञान नहीं वो है प्रेम अगर प्रेम को समझना ही तो हमें आध्यात्म को समझना होगा क्योंकि हर शब्दो को अर्थ हर प्रशन का उतर हमें आध्यात्म से ही मिल सकता है।
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