संदीप कुमार सिंह 18 Jun 2023 आलेख समाजिक पिता दिवस, माता _पिता का सेवा करना चाहिए, प्रतिदिन गंगा स्नान का फल मिलता है, उनका उपकार अनंत है, जिनके कारण से जन्म मिला, आनंदमयी दुनिया, तन_मन_धन, दुःख का सामान क्यों न हो, माता_पिता का अपमान नहीं करना चाहिए 22905 0 Hindi :: हिंदी
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥ पितरौ यस्य तृप्यन्ति सेवया च गुणेन च। तस्य भागीरथीस्नानमहन्यहनि वर्तते॥ सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥ मातरं पितरंश्चैव यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणम्। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तदीपा वसुन्धरा॥ पिता धर्म हैं, पिता स्वर्ग हैं,पिता ही परम् तप हैं। पिता के प्रसन्न रहने पर सब देवता भी प्रसन्न रहते हैं। जिनके सेवा से माता_पिता प्रसन्न रहते हैं उनके सद्गुणों से उन्हें प्रतिदिन गंगा स्नान का फल मिलता है। माता ही सभी तीर्थ हैं और पिता सभी देवों के स्वरूप हैं। इसलिए माता_पिता की सब प्रकार से पूजा करना चाहिए। माता _पिता की परिक्रमा से संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। माता _पिता का हमारे ऊपर ऐसा उपकार होता है जो किसी भी प्रकार से उतारा नहीं जा सकता है। चाहे आपको माता_पिता के कारण कितना भी दुःख का सामान क्यों न करना पड़ा हो फिर भी माता_पिता किसी भी सूरत में पूजने योग्य ही होते हैं। उनका यही उपकार अनंत है कि उन्होंने हमें जन्म दिया है। जिनके कारण से हमने अनमोल मनुज जन्म को पाया है। और इस आनंद मयी दुनिया में भरपूर मजा करते हैं। इसलिए भूल से भी माता_पिता का अपमान नहीं करना चाहिए। माता_पिता की बात हमें सर्वदा ही सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और तन_मन_धन से हमें सेवा करना चाहिए। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा) बिहार
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