Ajay kumar suraj 15 Jun 2025 आलेख प्यार-महोब्बत #मेरे_पिता – मेरे पहले गुरु, #मेरे_जीवन_का_आलोक #Fathers_day 16640 0 Hindi :: हिंदी
मेरे पिता – मेरे पहले गुरु, मेरे जीवन का आलोक
मुझे यह ठीक-ठीक याद नहीं कि पहली बार मेरे पिता ने मुझे कब गोद में उठाया था, या उस दिन की कोई स्मृति नहीं है जब उन्होंने पहली बार मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरा होगा। मैं बहुत छोटा था, शायद उस उम्र में जब हम दुनिया को अपनी आँखों से देखना तो शुरू करते हैं, पर शब्दों में उसे व्यक्त नहीं कर पाते। लेकिन आज जब 33 वर्ष की उम्र में, जीवन के कई पड़ाव पार कर चुका हूँ, तब समझ आता है कि मेरे जीवन की पहली मुस्कान, पहला सहारा, पहला विश्वास—सब कुछ उन्हीं से शुरू हुआ था।
मेरे पिताजी—जो आज 62 वर्ष के हो चुके हैं—हमेशा मेरे जीवन के केंद्र में रहे हैं। वे मेरे पहले गुरु थे, मेरे पहले संरक्षक, मेरे पहले आलोचक और मेरे पहले मित्र। उनका साया मेरे जीवन पर किसी वटवृक्ष की तरह रहा है—जो कभी अपनी छांव देता है, कभी अपनी जड़ों से स्थिरता, और कभी-कभी अपने कठोर तनों से सच्चाई की टकराहट।
बाहरी कठोरता, भीतर मधुरता
बचपन में मुझे कई बार लगता था कि पापा बहुत कठोर हैं। उनका अनुशासन हिटलर जैसा लगता था। उनके आदेश में कोई शिथिलता नहीं थी, और उनकी नजरों में अनुशासन से बड़ा कोई धर्म नहीं। समय की पाबंदी, पढ़ाई में ध्यान, बड़ों का सम्मान – ये सब उनके लिए सिर्फ बातें नहीं थीं, बल्कि जीवन के अनिवार्य स्तंभ थे। कई बार वे खड़ूस भी लगे, उनकी डांट तीखी लगती, और उनका सख्त चेहरा मुझे डराता।
पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, समझदारी आई, जीवन की उलझनों को झेला—तब महसूस हुआ कि उनका हर कठोर शब्द, हर तीखा निर्देश दरअसल मेरे जीवन की रक्षा के लिए था। वे नारियल जैसे हैं—बाहर से सख्त, पर भीतर से कोमल। उनके भीतर एक ऐसी कोमलता छिपी थी जिसे उन्होंने कभी शब्दों में नहीं बताया, पर हर बार जब मैं गिरा, उन्होंने मुझे थाम लिया। हर बार जब मैं असफल हुआ, उन्होंने मौन रहकर मेरा मनोबल बढ़ाया।
शब्दों से ज़्यादा मौन में था प्रेम
मेरे पिता बहुत बोलते नहीं थे। उनका प्रेम उनके स्पर्श में, उनके कामों में, और कभी-कभी उनकी डांट में भी था। उन्होंने कभी मुझे गले लगाकर 'आई लव यू बेटा' नहीं कहा, पर जब उन्होंने मेरे लिए आधी रात को दवा लाकर दी, या गर्मी में पंखा झलते हुए मुझे सुलाया – तब उनका प्रेम हर उस शब्द से बड़ा साबित हुआ जिसे मैं सुनना चाहता था।
उनका प्रेम दिखावटी नहीं था – वह एक मौन, स्थायी, समर्पित भाव था। उन्होंने कभी ज़रूरत से ज़्यादा कुछ नहीं दिया, पर कभी ज़रूरत से कम भी नहीं दिया। वे उस पिता की परिभाषा थे जो छाया की तरह होते हैं – दिखते नहीं, पर हर समय साथ रहते हैं।
पहले गुरु का प्रकाश
मुझे याद है, जब मैं छोटा था, उन्होंने मुझे पहले अक्षर सिखाए थे – ‘अ’ से अनार और ‘क’ से कबूतर नहीं, बल्कि ‘क’ से करुणा, ‘ध’ से धर्म, ‘स’ से सत्य। उन्होंने मुझे केवल किताबों की पढ़ाई नहीं सिखाई, उन्होंने जीवन की पढ़ाई करवाई। उन्होंने सिखाया कि जीवन में सच्चाई कितनी भी कठिन क्यों न हो, उस पर डटे रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि झूठ की नींव पर बने महल बहुत जल्दी ढह जाते हैं।
मेरे पिता ने मुझे भगवान के बारे में नहीं पढ़ाया, बल्कि उनके जीवन ने ही मुझे ईश्वर की अनुभूति कराई। उनके सेवा भाव, त्याग, निष्ठा और मौन तपस्या ने मुझे बताया कि असली अध्यात्म क्या होता है। उन्होंने मुझे यह एहसास दिलाया कि एक सच्चा पिता वही होता है जो अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाता है – न केवल बाह्य जीवन में, बल्कि आत्मा के स्तर पर भी।
पिता – मेरे विवेकानंद के रामकृष्ण
स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन की दिशा रामकृष्ण परमहंस के माध्यम से पाई थी। मेरे लिए मेरे पिता वही परमहंस हैं। उन्होंने मुझे आत्मा की बात बताई, उन्होंने कभी माला लेकर उपदेश नहीं दिए, पर उनके कर्मों की भाषा ही मुझे जीवन के सत्य तक ले गई। वे मेरे जीवन की पहली मंदिर घंटी हैं, जिसमें पहली बार ईश्वर के स्वर गूंजे।
अनुशासन और आत्मीयता का मिश्रण
अगर कभी पिता की छवि को दो हिस्सों में बाँटना हो, तो मैं कहूँगा – आधा अनुशासन, आधा आत्मीयता। एक तरफ वह पिता थे जो सुबह 6 बजे उठकर मुझे भी जगाते, “अब बहुत हो गया बेटा, देर तक सोना अच्छी बात नहीं।” और दूसरी तरफ वही पिता थे जो रात में मेरे तकिये के नीचे पैसे रख देते ताकि मेरी ज़रूरत पूरी हो सके।
वे मेरे जीवन के सेनापति थे – जिन्होंने मेरे भीतर अनुशासन की सेना खड़ी की, और मेरी आत्मा को सच्चाई का कवच पहनाया। मैं जब भी विचलित हुआ, उनका एक वाक्य मुझे संभाल देता था – “बेटा, मुश्किलें सबके जीवन में आती हैं, फर्क इस बात से पड़ता है कि तुम उनका सामना कैसे करते हो।”
हर असफलता में उनका सहारा
मैंने जीवन में कई बार असफलता का स्वाद चखा – नौकरी में, रिश्तों में, उम्मीदों में। पर एक बात कभी नहीं बदली – मेरे पिता का विश्वास। उन्होंने कभी मुझे दुत्कारा नहीं, न ही मेरी असफलता पर शर्मिंदा किया। वे बस कहते, “चल, अब अगले प्रयास की तैयारी कर।”
उनकी यह सरल, पर दृढ़ वाणी मेरे लिए संजीवनी बन गई। जब दुनिया ने मुझे नकारा, उन्होंने मुझे अपनाया। जब मैं खुद को छोड़ देना चाहता था, उन्होंने मुझे फिर थाम लिया।
आज भी हैं, हर रूप में
आज वे शारीरिक रूप से मेरे साथ हैं – उम्र के 62वें पड़ाव पर। उनके बालों में सफेदी की रेखाएँ हैं, चाल में थोड़ा ठहराव है, पर उनकी आँखों में वही तेज, वही दृढ़ता आज भी है। वे आज भी मेरी हर बात पर ध्यान देते हैं – चाहे मैं कुछ कहूँ या न कहूँ।
मैं जब भी किसी निर्णय में उलझता हूँ, आज भी उनकी नज़रें मेरी राहें आसान कर देती हैं। उनका आशीर्वाद मेरे हर काम में मेरे साथ रहता है। और यह सबसे बड़ा सुख है कि मैं आज भी उनके चरणों में बैठकर वह ज्ञान ले सकता हूँ, जो किसी भी किताब से नहीं मिलता।
एक अंतिम शब्द…
पिताजी, आपने हमेशा मुझे अपने साये में रखा, पर उड़ना भी सिखाया। आपने मुझे रोने दिया, पर कमजोर नहीं होने दिया। आपने मुझे गिरने दिया, पर बिखरने नहीं दिया। आप मेरे पहले गुरु हैं – और रहेंगे। आप मेरे जीवन का वह आलोक हैं, जिसकी रौशनी में मैं आज भी दिशा पाता हूँ।
आपके बिना मैं अधूरा हूँ। फ़ादर्स डे सिर्फ एक दिन नहीं, मेरे लिए हर दिन है – क्योंकि आप मेरे हर दिन में हैं।
आपके चरणों में सादर नमन।
अजय कुमार 'सूरज'