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मोह: विनाश का कारण – धृतराष्ट्र से सीखने योग्य पाठ

Disha Shah 30 May 2025 आलेख समाजिक #sahitylive #dangers of attachment effects of blind love Dhritarashtra and Duryodhana consequences of parental favoritism emotional blindness in parenting downfall due to attachment how attachment leads to destruction 28407 0 Hindi :: हिंदी

मनुष्य जीवन में कई प्रकार के भावनात्मक बंधन होते हैं – पुत्र मोह, स्त्री मोह, धन मोह। ये बंधन स्वाभाविक हैं, परंतु जब ये मोह अंधा बना दें, तब यही बंधन व्यक्ति के सर्वनाश का कारण बन जाते हैं। इतिहास गवाह है कि मोह में फंसा व्यक्ति न केवल सत्य का मार्ग छोड़ता है, बल्कि वह अपने साथ दूसरों का भी पतन सुनिश्चित कर देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत में मिलता है – धृतराष्ट्र का पुत्रमोह।

धृतराष्ट्र एक ज्ञानी, राजा और बुद्धिमान पुरुष थे, लेकिन वे अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में इतने अंधे हो गए कि उन्होंने अन्याय, अधर्म और अत्याचार को देखकर भी आँखें मूँद लीं। उन्होंने न केवल अपने पुत्र के गलत कार्यों को अनदेखा किया, बल्कि उसके अपराधों को भी अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया। उन्होंने जानते हुए भी कि दुर्योधन अधर्मी है, पांडवों के साथ अन्याय किया। परिणामस्वरूप, कुरु वंश का नाश हुआ, और अंत में धृतराष्ट्र को अपना सब कुछ खोना पड़ा – पुत्र, राज्य और यश।

यही मोह का परिणाम है। जब इंसान किसी के प्रति इतना आसक्त हो जाता है कि सही और गलत की पहचान भूल जाए, तब उसका अंत निश्चित होता है। आज के समय में भी कई माता-पिता अपने पुत्रों की गलतियों को जान-बूझकर नजरअंदाज करते हैं। वे सोचते हैं कि "हमारा बेटा है, चाहे जैसा भी हो, हमारा खून है।" लेकिन यह सोच केवल मोह है, सच्चाई नहीं।

सच्चा प्रेम वह होता है जो सही और गलत में फर्क करना सिखाए। यदि पुत्र गलत रास्ते पर जा रहा है, तो उसका विरोध करना ही माता-पिता का कर्तव्य है। पुत्र मोह में आंख मूंदकर उसका साथ देना न केवल उस पुत्र का भविष्य बिगाड़ता है, बल्कि परिवार और समाज को भी नुकसान पहुंचाता है। यह अन्याय का समर्थन है, और अन्याय का समर्थन कभी भी क्षमा योग्य नहीं होता।

मोह केवल पुत्र तक सीमित नहीं है। स्त्री मोह, धन मोह, पद मोह – ये सभी मोह व्यक्ति को अंधा बना सकते हैं। जब मनुष्य धन के पीछे इतना पागल हो जाता है कि वह ईमानदारी छोड़ दे, जब वह स्त्री मोह में अपने कर्तव्यों को भूल जाए, जब पद और प्रतिष्ठा की लालच में इंसानियत से गिर जाए – तब उसका पतन अवश्यंभावी होता है।

कर्म का सिद्धांत यही कहता है – जो जैसा करता है, वैसा भरता है। आज नहीं तो कल, अधर्म और मोह के कारण व्यक्ति को उसका फल मिलता ही है। यह प्रकृति का नियम है। मोह में फंसकर इंसान खुद को बचा नहीं सकता, क्योंकि मोह विवेक छीन लेता है, सोचने-समझने की शक्ति को खत्म कर देता है।

इसलिए, यह जरूरी है कि हम अपने जीवन में संयम रखें। मोह के जाल से बचें। प्रेम करें, लेकिन अंधा न हों। रिश्ते निभाएं, लेकिन सत्य और धर्म के साथ। पुत्र हो, पत्नी हो, पैसा हो – किसी भी चीज का अति मोह विनाशकारी है।

जीवन में संतुलन जरूरी है। जो मोह में नहीं फंसता, वही सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है। वही व्यक्ति सही निर्णय ले सकता है, वही समाज और परिवार को सही दिशा दे सकता है।

धृतराष्ट्र का इतिहास हमें यही सिखाता है – मोह में अंधा होना सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं है, बल्कि पूरे समाज के पतन का कारण बन सकता है। इसलिए समय रहते आंखें खोलें, मोह से बाहर आएं, और सत्य का साथ दें – चाहे वह कितना भी कठोर क्यों न हो।

अगर आप चाहें, तो मैं इसे किसी विशेष उद्देश्य (जैसे ब्लॉग, निबंध प्रतियोगिता, या अख़बार के लिए) के अनुसार और भी परिष्कृत कर सकता हूँ।

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