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दरिद्रता सूचकांक:

virendra kumar dewangan 30 Mar 2023 आलेख समाजिक Current affairs 115741 0 Hindi :: हिंदी

दरिद्रता सूचकांक:
	लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़-राज्य में 10,198 भिखारी हैं, जो राज्य में नौकरी से ज्यादा पैदा हो रहे हैं और भिखारीगीरी को जीवनयापन का साधन बना रहे हैं। 
इनमें 4995 पुरुष और 5203 महिलाएॅं हैं। इनके आंकड़ों पर संभागवार गौर फरमाएॅं, तो राजधानी रायपुर-संभाग एवं जिला भिखारी पैदा करने में सबसे अव्वल है, जहाॅ 2940 भिखारी संभागभर के पांच जिलों में हैं तथा रायपुर जिले में 746 भिखारी हैं, जो जिले के हिसाब से सर्वाधिक है। 
वहीं नक्सलगढ़ कहे जानेवाले बस्तर संभाग के सातों जिलों में सबसे कम 850 भिखारी हैं। 
बस्तर संभाग का सुदूर जिला-सुकमा, जो नक्सली वारदात के कारण देशभर में जानाजाने लगा है, वह भिखारियों के मामले में न्यूनतम 104 की संख्या के साथ सबसे बेहतर हालात में है।
	इसी तरह दुर्ग संभाग के पांच जिलों में 2790 भिखारी, बिलासपुर संभाग के पांच जिलों में 2830 भिखारी, सरगुजा संभाग के पांच जिलों में 1200 भिखारी हैं। 
उपर्युक्त समस्त संभागों में गतवर्ष की तुलना में 30 प्रतिशत भिखारियों की बढ़ोतरी हुई है। इस लिहाज से देखा जाए, तो वर्षभर में 3000 से अधिक भिखारियों का इजाफा हुआ है।
	गौरतलब है कि इन भिखारियों में पुरुषों की तुलना में महिला भिखारियों की संख्या अधिक है, जो महिला सशक्तीकरण, बराबरी के अधिकार, विधवा और परित्यक्तता विवाह तथा महिला स्वालंबन की योजनाओं की पोलपट्टी खोलने के लिए काफी है। 
सवाल यह कि महिला एवं बाल विकास विभाग की वे योजनाएं कहाॅं चल रही हैं, जो इन भिखारिन महिलाओं को लाभ नहीं दे रही हैं। यदि ये चल रही हैं, तो इनका लाभ इन्हें क्योंकर नहीं मिल रहा है? 
	चैंकानेवाली खबर यह भी कि स्टीलसिटी, ट्वीनसिटी, एल्यूमिनियमसिटी, जस्टिससिटी, स्मार्टसिटी, संस्कारसिटी, लौहअयस्क सिटी और न जाने कौन-कौन सी सिटियों के लिए ख्यातनाम छत्तीसगढ़ के नगरनिगम, नगरपालिका और नगरपंचायतें भी भिखारियों के मामले में गांवों से पीछे नहीं हैं। 
शहरों की तुलना में अपेक्षाकृत गांवों में कम भिखारी हैं, जो छत्तीसगढ़ के गांवों के लिए अच्छी खबर है।
	इस गौर-ए-काबिल खबर से समाज कल्याण विभाग में खलबली मची हुई है और वे सभी भिखारियों का बायोडाटा एकत्र करने के काम में जुटा हुआ हैं कि इनको निराश्रित पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा और दिव्यांग पेंशन क्यों नहीं मिल रहा है?...और यदि सरकारी सुविधाएॅं मिल रही है, तो फिर, ये भीख क्यों मांग रहे हैं?
	विदित हो कि भिखारियों की बड़ी संख्या तीर्थस्थलों, मंदिरों, बस व रेलवे स्टेशनों, गोल व सदर बाजारों और किसी कार्यक्रम के बाहर दिख पड़ती है। यदि इन्हें ही ट्रेस किया जाए, तो असलियत सामने आ जाएगी।
	कमोबेश यही स्थिति सारे देश के राज्यों में है। फर्क सिर्फ इतना है कि भिक्षावृत्ति कहीं कम है, तो कहीं ज्यादा है। यही कारण है कि भारत दरिद्रता सूचकांक में 116 देशों की सूची में 101 नंबर पर है।  
	किसी देश, प्रदेश, जिला, नगर व गांव में भिखारी बढ़ रहे हैं, तो इसका सीधा आशय यह है कि वहाॅं दरिद्रता, बेरोजगारी, सामाजिक उत्पीड़न, पारिवारिक विघटन और गैरजिम्मेदारी के हालात भयावह रूप में हैं। 
लोगों को आश्रय और काम नहीं मिल रहा है, इसलिए पेट भरने के लिए भीख मांगा जा रहा है। उनकी मजबूरी यह कि वे यह भी न करें, तो भूखे मरने की नौबत आ जाए।	
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अनुरोध है कि लेखक के द्वारा वृहद पाकेट नावेल ‘पंचायतः एक प्राथमिक पाठशाला’ लिखा जा रहा है, जिसको गूगल क्रोम, प्ले स्टोर के माध्यम से writer.pocketnovel.com पर  ‘‘पंचायतः एक प्राथमिक पाठशाला veerendra kumar dewangan से सर्च कर या पाकेट नावेल के हिस्टोरिकल में क्लिक कर और उसके चेप्टरों को प्रतिदिन पढ़कर उपन्यास का आनंद उठाया जा सकता है तथा लाईक, कमेंट व शेयर किया जा सकता है। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

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