Afsana wahid (moin raza ghosi) 03 Jul 2025 आलेख समाजिक Afsana wahid, poetry, artikal, story, shairy, blog writing, content writing, etc 24060 0 Hindi :: हिंदी
ज़रूर Afsana, यहाँ एक भावनात्मक, --- "क्यों भरा है आज के इंसान के दिल में इतना ज़हर?" एक आईना समाज के लिए कभी-कभी सोचता हूँ — क्या इंसान वाकई इतना बदल गया है, या बस उसकी परतें उतरने लगी हैं? क्यों आजकल लोगों के दिलों में इतनी नफ़रत, इतनी कटुता, इतनी जलन और अहम भर गई है कि मुलाक़ातें मुस्कानें नहीं लातीं, बल्कि शक, तंज़ और दूरी ले आती हैं? नफ़रत अब ज़ुबान से नहीं, आँखों से टपकती है कभी मोहल्लों में लोग गले मिलते थे — अब सोशल मीडिया पर ब्लॉक करते हैं। कभी रिश्तों में बहस होती थी — अब “Unfollow” करके सुकून मिलता है। कभी बहनें झगड़ने के बाद भी एक थाली में खाना खा लेती थीं, अब सालों तक एक-दूसरे से बात नहीं करतीं। हम इतने कट गए हैं… और वो भी अपने ही लोगों से। पर सवाल ये है — क्यों? क्या ये ज़माने की तेज़ रफ़्तार है? या हमारी नीयतों की धीमी होती सच्चाई? हमारा धैर्य कम हो गया है। हम सहन करना नहीं चाहते — हम बस “सुनाना” और “दिखाना” चाहते हैं। रिश्तों में अब सम्मान से ज़्यादा तर्क आ गया है, और तर्क हारने से नफ़रत जन्म लेती है। --- सोशल मीडिया: जहाँ रिश्ते भी रिएक्शन से तोले जाते हैं आज नफ़रत के बीज सोशल मीडिया ने भी खूब बोए हैं। लाइक्स, व्यूज़, कमेंट्स — हर चीज़ अब प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। "उसने मेरी फोटो पर दिल नहीं भेजा, मैं भी अब उसकी स्टोरी नहीं देखूँगा…" ये छोटी-छोटी बातें अब दिलों में बड़ी दरारें डाल देती हैं। हम अब सीधे नहीं पूछते — शक करते हैं। और शक से बड़ा ज़हर कोई नहीं होता। --- ईगो — जो इंसान को अकेला कर देता है आज हर इंसान को लगता है — "मैं सही हूँ।" "मेरे साथ गलत हुआ है।" "मेरी बात किसी ने नहीं समझी…" ये “मैं-मैं” वाली सोच हमें हम से अलग कर रही है। हम न रिश्ते निभा पा रहे हैं, न खुद को समझा पा रहे हैं। एक छोटी सी बात भी जब “मैं क्यों झुकूँ?” में बदल जाती है, तो रिश्ते “कभी के नहीं रहे…” में बदलते देर नहीं लगती। --- माफ़ी अब कमज़ोरी मानी जाती है कभी माफ़ करना इंसान की खूबसूरती होती थी। अब उसे कमज़ोरी समझा जाने लगा है। कोई अगर आगे बढ़कर हाथ बढ़ाए — तो लोग सोचते हैं, “ज़रूर कुछ चाहिए होगा…” दिल से निकली माफ़ी, अब शक की निगाहों से देखी जाती है। और यही सोच हमारे समाज को एक अहंकारी भीड़ में बदल रही है। --- बचपन में जो दिल साफ़ थे, वो अब सख़्त क्यों हो गए? क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि बचपन में हम ज़्यादा खुश थे? क्यों? क्योंकि तब दिल में मालिकाना हक़ नहीं था — माफ़ करना आता था। हँसना आसान था। रूठना भी मासूमियत से भरा था। आज… हम ज़रा-ज़रा सी बात पर दूरी बना लेते हैं। कटाक्ष कर देते हैं। जैसे सामने वाला हमारे दिल के लायक ही नहीं… --- तो क्या उम्मीद बची है? हां। बहुत है। जैसे रात के बाद सुबह आती है, नफ़रत के बाद भी मोहब्बत आ सकती है। बस हमें अपना आईना खुद से साफ़ करना होगा। कभी-कभी पहले हाथ बढ़ाना होगा। माफ़ करना होगा — और समझाना भी। हर बार हम सही नहीं होते — और हर बार दूसरा गलत नहीं होता। --- शायद आख़िर में… किसी ने सही कहा है: > “कभी वक़्त निकालकर सोचिए — कि जिस रिश्ते को आप छोड़ने जा रहे हैं, वो कहीं वही रिश्ता तो नहीं जिसने कभी आपकी रूह को सुकून दिया था?” --