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कृतज्ञता कब तक ?

Ajay kumar suraj 30 May 2024 आलेख प्यार-महोब्बत #कृतज्ञता_कब_तक ? #Kritagyata 32064 0 Hindi :: हिंदी

कृतज्ञता कब तक ?
मै जब भी दानवीर कर्ण को पढ़ता, सुनता, किसी दृश्य साधन से उसकी जीवनी कहानियों को देखता तो कर्ण को बहुत कोशता l सारी गलती इसी की है,क्यों यह दुर्योधन के अहसानों तले दबा है,और उसके प्रति बार बार अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता रहता है ? 
    दुर्योधन तो उसपर एक ही बार तो अहसान किया है ,जब पांडव उसे सूद पुत्र कहकर संबोधित कर रहे थे, तब दुर्योधन ने उसे अंग प्रदेश का राजा बनाकर उस पर एक बार  अहसान किया l और उसकी कृतज्ञता वयक्त करने के लिए अंगराज कर्ण ने ना जाने कितने राज्य जीतकर दुर्योधन के कदमों में डाल दिए l फिर भी दुर्योधन उसे अपनी कृतज्ञता के ऋण से मुक्त न कर उसे मित्रता के मोह में बांधे रखा l दुर्योधन कहीं पर अनीति भी करता तो कर्ण जानते हुए भी अनजान बनकर उसका साथ देता l 
                                     मुझे इस बात से हमेशा चिढ़ रहती क्या दोस्ती और मित्रता के लिए अपना सब कुछ गिरवी रख देना अच्छा है ? क्या मित्रता की लाज रखने के लिये जहाँ आप सही हो और मित्र गलत हो तो भी मौन धारण कर  लिया जाय l   
                      अब मै  भी मित्रता का दामन थाम लिया था, मेरे संघर्षो में मैं  सफल न  हुआ  था, पारिस्थिति  ने मुझे सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक हर दशा में विकलांग बना दिया था l और वह कार्य कुशलता के जरिये आगे बढ़ते चले जा रहे , भूतपूर्व प्रधान, से लेकर विद्युत् विभाग के कर्मचारी तक का कार्य किये l इसी अंतराल के बीच कुछ अहसान उसने मुझपे किये l  
                                       जिन्दगी ने उतार – चढ़ाव दिए कभी वो मेरे लिए कभी मैं उनके लिए कुछ  खटास आयी दूरियाँ हुई फिर नजदीकियां बढ़ी l साथ ही काम भी बढ़ता चला गया l
कई जगह वो गलत थे फिर भी मै उनकी हाँ में हाँ मिलाता चला गया l क्योंकि कुछ अहसान थे और कुछ रोजगार न  होने के कारण अपना खर्च चलाने के लिए उनके साथ कार्य करने की निर्भरता l
                                                 मुझे याद है दुर्योधन जब कहीं असफल होता, क्रोधित होता और कर्ण उसे समझाने की कोशिश करता तो दुर्योधन अक्सर कहता “जाओ मित्र जाओ मैं तुम्हें अपने मित्रता के ऋण से मुक्त करता हूँ” l जो अंगराज उसके अहसानों के बदले उसे अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी दान कर चुका था,उसको अहसान और मित्रता के ऋण से तुम क्या मुक्त करोगे ? अगर ज़रा सा विवेक होता तो स्वंय तुम उसके ऋणी  होते दुर्योधन l
                  जब भी अपने कार्यो के निस्तारण के लिए वह निकलते तो अक्सर मुझे साथ ले जाते और किसी आदमी या व्यक्ति से जब पासा वसूलना हो तो मुझे आगे कर देते, खुद यह कहते मै कर्मचारी हूँ मुझे प्रत्यक्ष रूप से किसी से वसूली करने में दिक्कत हो सकती है इसलिए मैं तुमको साथ लाता हु और जेब खर्च भी तो देता हूँ l
                              कुछ अहसान कुछ मजबूरियां मुझको इक्षा न  होने पर भी वे काम करने पड़ते जो उचित नहीं थे l अगर मैंने कभी समझाने की कोशिश की तो मेरा ही मान हनन करते लोगों के सामने और बोलते यार मजाक कर रहा हूँ ,तुमसे नही करूंगा तो फिर किससे करूंगा l 

सरासर भूल करतें है ,उन्हें जो प्यार करतें हैं l
बुराई कर रहें है और अस्वीकार करतें हैं l l


               पोस्ट ग्रेजुवेट और शिक्षक शिक्षण – प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र केंद्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले व्यक्ति को जो बोलोगे वह भाव समझ ण आयेगा क्या ? वर्ष 2019 – 2024 का वक्त बीत गया उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा और केंद्र सरकार द्वारा कोई रोजगार न निकाला गया l न ही उस पर चर्चा हुई,जो भर्तियां आयी भी वह भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ गयी l समाज, लो, परिवार एक बेरोजगार की कद्र कितनी करते है वो आप पाठकों को अच्छी तरह पता है l कसीदे कस कर हाल पूछना क्या यही सच्ची मित्रता है ?
                    
    भरी सभा में द्रौपदी वस्त्रहरण के बाद कर्ण को आभास था की वह गलत है जिसका प्रायश्चित उसने करना भी चाहा और दुर्योधन के हठ को मना करने की कोशिश भी की पर दुर्योधन ने कहा मुझे अपने बहुबल पर भरोषा है तुम मुझे छोड़कर जा सकते हो कर्ण l
                      वैसे ही मुझे अहसास हुआ जब मेरे मित्र ने ही कहा  तुम काम ले लिया करो हम उसको कर के देंगे पैसे थोड़े ज्यादा लगेगे l मैंने उनकी बात मानी पर काम तो कराये पर सही नहीं l सामने वाला मुझसे अपने काम की जानकरी पूछ रहा मै बता ही नही पा रहा और ओ न  ही उसे सच बताने दे रहे न  कार्य l और कार्य जो किया ओ भी गलत, जब मैंने समझाने की कोशिश की तो पैसा ले लो मुझे कोई काम मत देना l और ज्यादा हरिश्चंद मत बनो l कितने दिन काम किये एक रुपये भी न  लिए यार दोस्ती बरकार रहे, कभी वक्त था इन्होने मदद की थी l
        मुझमे कहीं न  कहीं एक प्रकार का डर बना भी रहता है, किसी ने विश्वास कर जो कार्य और जिम्मेदारी दी है वह मुझसे पूर्ण हो जाए l पर कार्य भार जब दूसरों के हाथों में चला जाए,तो वह किस प्रकार छलता है उसका अहसास कोई धोखा खाया हुआ व्यक्ति ही कर सकता है lवह डर यह रहा की सामने वला व्यक्ति कितनी उम्मीदे  लगाये इंतज़ार कर रहा है और मै चाह कर भी खरा नही उतर पाया उसकी निगाहों में l 
                            पर आज वर्तमान के युग में कब तक अहसान और कृतज्ञता का भाव कैसे चले | यह मेरे पाठकों पर निर्भर है आप बताना

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