संदीप कुमार सिंह 09 Jun 2023 आलेख समाजिक मेरा यह आलेख समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 27513 0 Hindi :: हिंदी
बचपन का विद्यालय जीवन भर भूले से भी भुलाया नहीं जा सकता है। जहां बच्चों के शिक्षा का आधार रखा जाता है। उन दिनों का वह विद्यालय ज्यादा श्रृंगारित तो नहीं लेकिन आकर्षक जरूर रहता था। शिक्षकों का पढ़ाने का तरीका भी उनके समय के हिसाब से ठीक ही था। दो_चार शिक्षक और तीन सौ से चार सौ तक विद्यार्थी। शिक्षक लोगों को सम्हालना मुश्किल हो जाता था। आठ क्लास तक की व्यवस्था रहती थी। प्रत्येक क्लास का अपना _अपना एक मोनिटर हुआ करता था। कुछ जिम्मेदारी मोनिटर भी सम्हालता था। अपने _अपने विद्यालय के विद्यार्थी आज जो जहां हैं उनके बचपन का विद्यालय का ही देन है। हिज्जे, माने हिन्दी में याद करना बड़ी ही मजेदार हुआ करती थी। नहीं याद होने पर शिक्षक की वह छड़ी भी याद आती है। जो की तुरंत चला देते थे। फिर टिफिन का समय तो और भी मजेदार हुआ करता था। टिफिन लाने का चलन उस समय गांव में नहीं था। सो टिफिन होते ही सभी बच्चे सरपट दौड़ लगाकर घर की ओर भागता था। कितने बच्चे गिर भी जाता था, चोट लगता, छिला जाता फिर भी चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती थी। फिर खा कर वापस से विद्यालय में आना बड़ा ही आनंद दायक लगता था। कुछ बदमाश किस्म के बच्चे तो स्कूल आने के बजाय कहीं ओर भी भाग जाता था। फिर दूसरे दिन उन बच्चों को दंड मिलता था, जैसे मुर्गा बनाना, कान पकड़ के उठक_बैठक कराना, नहीं ये सब करने पर छड़ी से स्वागत करना। बड़ा अजीब सी खुशी दूसरे विद्यार्थियों को मिलती थी। फिर छुट्टी होने के एक घंटा पहले पंक्ति बद्ध होकर गिनती करना जोर_जोर से कमाल होता था। एक बच्चा का आगे_आगे गिनाना और पीछे से सारे एक साथ गिनते थे। एक आवाज की सैलाब निकल जाती थी। घर घर तक आवाज जाती थी।और फिर उसके बाद चार बजे शाम को छुट्टी होती थी। सारे बच्चे हुर्रे करते हुए भागते _दौड़ते घर पहुंचते थे। इस तरह से बचपन का विद्यालय का हमारे जीवन में एक अहम योगदान है। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा) बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....