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अबॉर्शन: एक मासूम जान की हत्या या विकल्पहीन मजबूरी?

Disha Shah 18 Apr 2025 आलेख दुःखद 27279 0 Hindi :: हिंदी

आज के दौर में विज्ञान ने जितनी तरक्की की है, उतनी ही तेजी से समाज में नैतिक और संवेदनशील मुद्दे भी जन्म ले रहे हैं। इन्हीं में से एक है अबॉर्शन यानी गर्भपात। यह विषय जितना चिकित्सा से जुड़ा है, उतना ही भावनाओं और इंसानियत से भी। हर दिन सैकड़ों मासूम जानें कोख में ही दम तोड़ देती हैं, जिन्हें इस दुनिया में आने का मौका तक नहीं मिलता।

अबॉर्शन क्या सच में अपराध है?
जब हम अबॉर्शन की बात करते हैं, तो एक बात साफ हो जाती है कि यह सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक जीवन के खात्मे का रास्ता है। जिस समय एक भ्रूण माँ की कोख में पल रहा होता है, वह एक जीवन होता है, एक धड़कता दिल। ऐसे में जब जानबूझकर उसे खत्म किया जाता है, तो क्या यह हत्या नहीं कहलाएगी?

आजकल कुछ लोग निजी आज़ादी, करियर, सामाजिक दबाव या अन्य कारणों का हवाला देकर अबॉर्शन करवा लेते हैं। पर सवाल यह है कि क्या किसी भी वजह से एक मासूम जान को खत्म करना सही है? क्या हमारी इच्छाएं किसी की जिंदगी से बड़ी हो सकती हैं?

अबॉर्शन की दर्दनाक हकीकत
कुछ किताबों और डॉक्यूमेंट्रीज़ में अबॉर्शन के तरीकों का जिक्र किया गया है, जिसे पढ़कर और देखकर किसी का भी दिल दहल जाए। कहीं भ्रूण को कैंची या किसी अन्य औजार से काटकर निकाला जाता है, तो कहीं उसे जहर देकर मार दिया जाता है। कहीं उसे जिंदा बाहर निकालकर एक बाल्टी में फेंक दिया जाता है। ये सब बातें सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि क्रूर सच्चाई हैं, जिनसे कई मासूम जिंदगियाँ खत्म होती हैं।

क्यों ज़रूरी है सख्त कानून?
सरकारों को चाहिए कि वे अबॉर्शन पर सख्त कानून बनाएं। क्योंकि जहां कानून ढीला होता है, वहां अपराध फलता-फूलता है। अगर एक भ्रूण को भी इंसान का दर्जा मिले, तो उसकी हत्या करने वाले को भी उसी तरह सज़ा मिलनी चाहिए जैसे किसी बाहर जी रहे व्यक्ति की हत्या पर मिलती है।

क्या हर अबॉर्शन गलत है?
हालांकि कुछ मेडिकल परिस्थितियाँ होती हैं जहाँ माँ की जान को खतरा हो या बच्चा गंभीर विकृति से ग्रस्त हो, तब डॉक्टर सलाह देते हैं अबॉर्शन की। लेकिन ये केस सीमित होते हैं और मजबूरी में किए जाते हैं। समस्या वहां है जहाँ बिना किसी गंभीर कारण के अबॉर्शन सिर्फ “चॉइस” बन जाता है।

क्या है समाधान?
यदि कोई महिला बच्चा नहीं चाहती या उसे पालने में असमर्थ है, तो उसे वैकल्पिक रास्ता अपनाना चाहिए। देश में कई अनाथ आश्रम हैं, कई दंपत्ति ऐसे हैं जो वर्षों से बच्चे की आस लगाए बैठे हैं। ऐसे में अगर कोई महिला बच्चे को जन्म देकर उसे गोद दे, तो यह एक पुण्य कार्य होगा। मासूम की जान भी बच जाएगी और किसी की जिंदगी भी संवर जाएगी।

कुदरत का न्याय
कई बार ऐसा देखा गया है कि जो महिलाएं बार-बार अबॉर्शन करवाती हैं, उन्हें भविष्य में संतान नहीं हो पाती। यह कुदरत की सज़ा है, जो जीवन देने वाली शक्ति से खिलवाड़ करने पर मिलती है। माँ बनना एक वरदान है, लेकिन जो उस वरदान को ठुकराता है, उन्हें अक्सर जीवन में पछताना पड़ता है।

निष्कर्ष
अबॉर्शन सिर्फ एक मेडिकल टर्म नहीं, बल्कि एक नैतिक और मानवीय सवाल है। मासूमों की हत्या को “पसंद” या “स्वतंत्रता” का नाम नहीं दिया जा सकता। सरकार को सख्त कानून बनाने चाहिए ताकि मासूम जिंदगियाँ बच सकें। एक माँ का कर्तव्य है अपने बच्चे की रक्षा करना, न कि उसकी जान लेना।

हम सबको मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी नन्ही जान के साथ अन्याय न हो। अबॉर्शन को कम करने के लिए जागरूकता, नैतिक शिक्षा और सहारा देने वाली नीतियाँ बनाना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। क्यूँकि एक जान, चाहे वो कोख में हो या दुनिया में – अनमोल होती है।

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