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आज कि शिक्षा व्यवस्था और सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले

Pinky Kumari 03 Apr 2023 आलेख समाजिक 43685 0 Hindi :: हिंदी

आज में शिक्षा व्यवस्था पर बात करूगी आज के समय में शिक्षा एक व्यापार बन कर रह गया है। शिक्षा एक कमाई का साधन बनकर रह गयी है। एडमिशन का समय चल रहा है सबके मुह पर एक ही नाम हमारी स्कूल अच्छी है। हमारी स्कूल में सबसे ज्यादा गेम लिखाते हमारी स्कूल में नये - नये प्रोग्राम होते है। या हमारी स्कूल सिर्फ एक महिने में आपके बाचों के इंग्लीश सिखा देगी यह देखो हमारी स्कूल के बच्चों के विडियो कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलते में मानती हूँ कि किसी चार बच्चों को जिनको अंग्रेजी के चार शब्द सिखा कर कमरे के आगे घड़ा कर देते है।

 तो इससे क्या प्रूफ है। कि आपकी स्कूल एक महिने में बच्चों को इंग्लिश सिखा देगी और हमारी स्कूल बहोत बड़ी है। या हमारी स्कूल में 10 माले है। बस इन्ही बातों से शिक्षा व्यवस्था को एक व्यापार बना कर रख गयी है। कोई यह नहीं कहता कि हमारी स्कूल में पढ़ाई और समय का बहोत महत्व है। पढ़ाई के साथ- साथ हम जिवन को जिने का सही तरीका सिखाते है। हम पढ़ाई के साथ- साथ बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान भी देते है। और साथ ही हमारे इतिहास के बारे में बच्चों को बताते है। बल्की स्कूलो में तो इतिहास के बारे में उल्टा पढ़ाया जाता है। कि इतिहास तो बोरिंग सब्जेक्ट है। चलो हम तो गेम खेलते है। और खेल - खेल में पता चला कि उस बच्चें का जीवन ही खेल बनकर रह गया यही कारण जिस समय में बच्चों को पढ़ाई का सही ज्ञान होना चाहिये था। उस समय में उन्हें स्कूलो में खेल खिलवाये जा रहें थे और आज वो ज्ञान उन्हें नहीं हैं। तो वहीं बच्चें डिप्रेशन कि गोलिया खा रहें और फासि खा रहे है। उनसे कोई नहीं पुछता कि बच्चों तुम क्या बन्ना चाहते है। जिवन मे क्या बन्ना है। वो क्या चाहते है। हमारा समाज के प्रति क्या कत्वय होने चाहिये हमारे अपने लिये घर वालो के प्रति क्या कत्वय होने चाहियें हमारे देश का क्या इतिहास रह चुका है।


जिवन को कैसे जिया जाये इन सब बातो का ज्ञान समय रहते हुवे सिखा दिया जाता तो आज उनका जिवन खेल नहीं होता वो घबराते नहीं बल्की हर परिस्थित में खड़े हो कर हर बुरी परिस्थितियो का सामना करते और के समय में शिक्षा व्यवस्था कि यह हालत है। कि बच्चों को देश के प्रधानमंत्री कौन है। और प्रधानमंत्री होता कौन है। राष्ट्रपति कौन है। राष्ट्रपित का क्या काम हैं। इन्ही छोटी - छोटी बातो को आज के बच्चे नहीं जानते है। आज के समय में बच्चों को ज्ञान इतना ही दिपा जाता है। कि उसका जिवन चल जाये पर जिवन को कैसे और क्यों जिना है। यह ज्ञान बच्चो को नहीं दिया जाता है। और माता - पिता कि बात ही क्या वो बच्चो को अच्छे नम्बर लाने कि रेस में खड़ा कर देते है। मुझे बहोत अफसोस होता है। कि बच्चे छोटे - छोटे सवालो का जवाब नहीं दे पाते है। जैसे कि हमारे देश के पहले प्रधानमंती कौन थे हमारे देश कि पहली महिला प्रधानमंत्री कौन थी । हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री कौन है। राष्ट्रपति कौन है। और इनके शब्दो का अर्थ क्या है। इनका क्या कतर्व्य होता देश के प्रति इन्ही कारणों कि वजह से हमारे देश कि दोर गलत होतो में चली जाती पढ़ाई का मतलब वहीं समझ सकते जिन्होंने पढ़ाई कि है। जिन्होंने जिवन को समझा है। और जो पढ़ाई नहीं कर पाते या पढ़ाई का मतलब नहीं समझते है उनके लिये पढ़ाई एक ज्ञान ना होकर एक संसाधन मिला तो टिक है निहीं मिला तो टिक है। 

पढ़ाई के ज्ञान को समझों पढ़ाई कोई रटने कि चिज नहीं है। पढ़ाई का मतलब जिवन के प्रति ज्ञान होना, सही गलत का ज्ञान होना, देश के इतिहास के बारे में ज्ञान होना, रानितीके बारे में ज्ञान होना, धार्मिक ज्ञान होना, समाज को लेकर ज्ञान होना और सबसे पहले खुद के बारे में ज्ञान होना और खुद को जान्ना आदि बातो का ज्ञान होना जो कि आज कि शिक्षा व्यवस्था में बिल्कुल भी नहीं में कहू कि आज कल के बच्चों इन बातो को लेकर बिल्कुत भी ज्ञान नहीं और नाहीं यह ज्ञान उन्हें स्कूलो में दिया जाता है। और नाहीं उनके माता पिता इनके बारे बताते है। माता पिता तो नही बताये कमसे कम स्कूल वाले तो बताये इतनी फिस लेते हो कहीं तो उन पैसों का इस्तेमाल करों और पढ़ाई भी पैसो वालो तक सिमित होगयी है। अगर कोई गरीब का बच्चा बढ़ना चाहे तो वह नहीं पढ़ सकता क्योंकि कि फिस ही इतनी महगी हो चुकी है। सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले इन्हें कौन नहीं जानता यह हमारी भारत कि प्रथम महिला शिक्षका रह चुकी है। इनके नाम पर स्कूले और कॉलेजेस खुले है। पर यह नाम दिखावे तक सिमित रह गया है। अगर आज के बच्चो को इनके बारे पूछा जाये तो नहीं पता होगा आप सोचते होगे कि आपके लेख में आज के समय के बच्चों को लेकर ऐसी सोच क्यू है। मुझे चिता आज के बच्चों लेकर तो है ही हैं। साथ ही  साथ ही आज कल के जो शिक्षक है। और में सभी शिक्षको लेकर नहीं बोल रहीं हूँ पर हा कुछ ऐसे शिक्षक है। जो सिर्फ बच्चों के साथ महनत कम पैसे ज्यादा लेना जानते है।

एक तरह से कहूँ कि व्यापार करते है। जो सावित्रीबाई जिन्होंने भारत में शिक्षा व्यवस्था कि निव रखी इस शिक्षा व्यवस्था को बनाया आज हम उन्हें भुल गयें है। जो महिला बच्चों में गरीबी और अमीरी का फर्क किये बगेर सभी बच्चों को बराबर शिक्षा देने में विश्वास रखती थी आज के समय में स्कूत धर्म जाति अमिरी गरीबी ऊच निचा आदि को देखकर बन्ने लगे है। इन्ही को देखर कर शिक्षा दी जाती वह एक तरह से गलत है। हमारे समाज के लिये भी और देश के लिये भी

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