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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

विचारों की सांसों में, मधुर समां समाने दो। मधुर बयार संतृप्त, विचारधारा बहाने दो। शुद्धता समवेत विचारों को, रश्मियाँ फैलाने दो। � read more >>
थमा न थमेगा, ऊंट, झूठ का चक्का। मौका़ मिलने पर दोनों, लंबा मारते छक्का। ऊंट, झूठ अंत में, दोनों भागते मक्का। पकड़ा पथ छोड़े नहीं, कच� read more >>
यह दुनिया, है भ्रम का टपरा। वरना मनुज, है मिट्टी का कमरा। भ्रम ही तो है, जिस पर टिकी है धरा। भ्रम का ही खेल है, पर-परा। तेरा, मेरा, सबक� read more >>
एक बीज वपन से, पौधे उगते दो। कभी सामने वो, तो कभी सामने वो। पता नहीं कब, कौनसा, भाग जाए दे खो। यमली उपज से, मनुज बना, है सामने जो। विश्� read more >>
लीक- लीक कीक में, कभी-कभी रहती कमी। लीक से बेलीक ना होते, तो दुनिया रहती दबी थमी, असल नसल गई मसल, फल फूल रहा क़लमी, खुला दिमाग़ फले- फूल� read more >>
छूटा हुआ छोड़ गया, कल है कल की ओट। अब ही सब है, भूत, भविष्य की बांधता मोट। अब को ही साध ले, होगा विकास स्फोट। भूत, भविष्य सब लगाते, इसके read more >>
होत में होता, नानी का श्राद्ध। होत में दादा का, जन्मदिन आता याद। साल की लड़की की लड़की का, मायरा लेते लाद। ख़लक़ पहुंचता, काज़ी की क read more >>
जब तक मौक़ा नहीं मिले, पहनें ईमानदारी का चोला। मौक़ा मिलते ही झोले से, निकले बम का गोला। काम सरे तो खूंटी टांग दें, ईमानदारी का झोला� read more >>
ज़मीं पर बैठ, कभी चलती, कभी फुदकती है। कभी खा़मोश, कभी खालसा- सा गाती, कहां सुनती है? कभी फुर- फुर फुरती में। कभी सघन में सघन ढूंढ़ती है read more >>
मैं मेरे पुरखों के मकान में निवास करता हूं। न चाहते हुए भी वृद्धावस्था की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। सुबह -शाम बारीनुमा मंदिर में पूजा -अर्� read more >>
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