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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

मैंने अपनों की, कभी पहचान नहीं की। मैं अपनों में भी, अपना ढूंढ़ता रहा। स्वार्थ छुरी से, उनका सर मूंड़ता रहा। मैंने कभी मीठी, ज़बान � read more >>
वह मुझे, वह मुझे मारेगा, जगा मन-चोर। बम, बारूद, मिसाइल, तैनात चारों ओर। परमाणु भंडार होड़ में, बन रहे अहबाबख़ोर। अहम् के वहम में, सहम, read more >>
मन ज़मीं में, पवित्र विचारों के बीज बोएं। भूत को भूत बना, भविष्य के सपने संजोएं। काफी़ के फेर में, बा़की क्यों खोएं? फटे दूध माखन नह� read more >>
मैं रोज़ की तरह ऑफिस से घर आते समय सब्जी़वाले बाबा के पास जो कि खुद के खेत से सब्जी़ लाकर बेचता था, रुका। मैं बाइक के स्टैंड लगाकर एवं ए� read more >>
झाड़ी सरदई, मंजरित मंजर। धीरे-धीरे बेर रसीले, पक गए बेख़बर। खाने वाले उस खा़ना पहुंचे, अपनी -अपनी डगर। बेरों से ज्यादा कांटे, है क� read more >>
अयौध्या, विराजे रामलला। 2019 में, आया कोर्ट फ़ैसला। मिटा तारीक, निर्माण व्यस्त सारा अमला। मोदी सामने मोम है, हर बला। राम जन्मभूमि � read more >>
मिलती है। मेवाड़ की पाग में, जौहर की आग में। पन्ना के त्याग में, अकबर की लाग में। जयमल पत्ता के रण में, हाडा़ रानी के पण में। मातृभू� read more >>
कई- कई का, है बेशर्मी में सार। कर बेहयाई, समझे चतुराई, बनते डेढ़ होशियार। उसकी तो है उतरी हुई, औरों की झट ले उतार। एक नकटा, सौ पर भारी read more >>
विचारों को विस्तार दो, वाणी को संस्कार दो। बुद्धि को धार दो, कर्म को हुंकार दो। नौका, गहरी पैठ उतार दो, हाथों को नई पतवार दो। परवाज़ � read more >>
मौसमी मेंढक, करते टर्र -टर्र। तनापाई पानी में, सर्र सर्र। पानी, ज़मीं दोनों कांपे, थर -थर। खुद, दूसरे बेचैन, सुन चर- चर। गया मौसम, वह� read more >>
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