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Santosh kumar koli ' अकेला'
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Santosh kumar koli ' अकेला'
Santosh kumar koli ' अकेला'
Santosh kumar koli ' अकेला'
@ santosh-kumar-koli
, Rajasthan
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My Articles
अपने और मैं
मैंने अपनों की, कभी पहचान नहीं की। मैं अपनों में भी, अपना ढूंढ़ता रहा। स्वार्थ छुरी से, उनका सर मूंड़ता रहा। मैंने कभी मीठी, ज़बान �
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युद्ध- हौआ
वह मुझे, वह मुझे मारेगा, जगा मन-चोर। बम, बारूद, मिसाइल, तैनात चारों ओर। परमाणु भंडार होड़ में, बन रहे अहबाबख़ोर। अहम् के वहम में, सहम,
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बात की बात
मन ज़मीं में, पवित्र विचारों के बीज बोएं। भूत को भूत बना, भविष्य के सपने संजोएं। काफी़ के फेर में, बा़की क्यों खोएं? फटे दूध माखन नह�
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सभ्य कौन
मैं रोज़ की तरह ऑफिस से घर आते समय सब्जी़वाले बाबा के पास जो कि खुद के खेत से सब्जी़ लाकर बेचता था, रुका। मैं बाइक के स्टैंड लगाकर एवं ए�
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मजबूरी से मज़बूती
झाड़ी सरदई, मंजरित मंजर। धीरे-धीरे बेर रसीले, पक गए बेख़बर। खाने वाले उस खा़ना पहुंचे, अपनी -अपनी डगर। बेरों से ज्यादा कांटे, है क�
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राम मंदिर निर्माण
अयौध्या, विराजे रामलला। 2019 में, आया कोर्ट फ़ैसला। मिटा तारीक, निर्माण व्यस्त सारा अमला। मोदी सामने मोम है, हर बला। राम जन्मभूमि �
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राजस्थान की झलक
मिलती है। मेवाड़ की पाग में, जौहर की आग में। पन्ना के त्याग में, अकबर की लाग में। जयमल पत्ता के रण में, हाडा़ रानी के पण में। मातृभू�
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बेशर्म
कई- कई का, है बेशर्मी में सार। कर बेहयाई, समझे चतुराई, बनते डेढ़ होशियार। उसकी तो है उतरी हुई, औरों की झट ले उतार। एक नकटा, सौ पर भारी
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बदलना तो है
विचारों को विस्तार दो, वाणी को संस्कार दो। बुद्धि को धार दो, कर्म को हुंकार दो। नौका, गहरी पैठ उतार दो, हाथों को नई पतवार दो। परवाज़ �
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मौसमी मेंढक
मौसमी मेंढक, करते टर्र -टर्र। तनापाई पानी में, सर्र सर्र। पानी, ज़मीं दोनों कांपे, थर -थर। खुद, दूसरे बेचैन, सुन चर- चर। गया मौसम, वह�
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