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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

बनता योग, कुयोग, वक़्त का। बदलते तख्त़नसीन, तख्त़ का। कुयोग से संवलित, मिलता गर्द में। सुयोग का संवारा, चमकता इतिहास फ़र्द में। कइयो read more >>
मूल से सिरा, जाता दूर। बदलते जाते, सरूर, लूर। ज्यों- ज्यों घटता, लगाव नूर। साथ रहने, दिखने, को मजबूर। ज्यों-ज्यों बढ़ता, बढ़ती आंट। अप� read more >>
कोई रोटी हलाल की, कोई हराम की खाता है। कोई रोटी बेचकर, कोई खरीदकर कमाता है। कोई मारकर, कोई बचाकर, रोटी जुगाड़ बिठाता है। कोई ज़ोराज़ोर read more >>
एक डाल पर नवांकुर, नव मन, नव उमंग। जड़, डाल से पोषित, प्रफुल्लित हर अंग। धीरे-धीरे लगा दिखाने, खुदमुख्त़ारी, खुदरंग। मन लगा मचलने, उड़न read more >>
संतप्त जग में तृष्णा, संसक्त हर मन में। डाह, श्रांति विचरते, हर तप्त तन में। व्याकुल, व्यथित मन संतृप्ति, ढूंढता शहर, कानन में। आग से ब� read more >>
वह वीर लड़ा, न तनिक डिगा, सबको दिया, जो जिसके हिस्से है। जो लिया वही जान गया, ये अर्जुन सुत, वासुदेव का शिष्य है। बाण मूठा का मूठा, झट रथ ट� read more >>
महारथी हो रथारूड़, चक्रव्यूह में चक्कर काट रहा। एक से बढ़कर एक कायर, कपटी, कोई न किसी से घाट रहा। हिन -हिन करते अश्व, पहिए घरर -घरर करते थ� read more >>
एक डाल पर पल्लव, उसी पर जरी पात है। एक में जोश, दूजे में होश, दोनों पर समय का हाथ है। एक देखे उत्तर, दूसरा दक्षिण, देखे नहीं एक दूजे को। क� read more >>
दुर्योधन सोचा मन में, मुझे इसी की तलाश है। है भुज, बाण में जान, काट सकता अर्जुन के बाण, यह अर्जुन का काल है। बोला दुर्योधन, योद्धा के अपम� read more >>
हाय, मैंने यह कब, क्या कर दिया? मैं तो मां बनाया था, सीने में इतना त्याग, किसने भर दिया? इतना सोचकर खुदा, ग़म खा गया, पन्नाधाय बनाने की, आग� read more >>
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