Santosh kumar koli ' अकेला' 18 Jun 2024 कविताएँ समाजिक अब ही सब 33566 0 Hindi :: हिंदी
छूटा हुआ छोड़ गया, कल है कल की ओट। अब ही सब है, भूत, भविष्य की बांधता मोट। अब को ही साध ले, होगा विकास स्फोट। भूत, भविष्य सब लगाते, इसके क़दमों में लोट। रीते मन में, बीते आते ख़याल। बीते ख़याल निकाल, अब से मिला सुर- ताल। भूत कदी, होता कदी, है जी का जंजाल। अब की थूनियों पर खड़ी है, भविष्य की चाल।