Santosh kumar koli ' अकेला' 02 Jul 2024 कविताएँ समाजिक भ्रम -भ्रमण 39890 0 Hindi :: हिंदी
यह दुनिया, है भ्रम का टपरा। वरना मनुज, है मिट्टी का कमरा। भ्रम ही तो है, जिस पर टिकी है धरा। भ्रम का ही खेल है, पर-परा। तेरा, मेरा, सबका, भ्रम वर्म ही तो है। तुझे मेरी, मुझे तेरी, शर्म ही तो है। भ्रम का पोषक, कर्म ही तो है। जीवन भ्रम, कर्म का, मर्म ही तो है। मत उठाओ, भ्रम का परदा। पोल खुली, उठा परदा यदा- यदा। क्या हो यदि पता चल जाए, क्या है बदा? बदा बनक को, बांच न सकी शारदा।