Anilkumar Rathwa (Sameer) 25 Jan 2026 कविताएँ समाजिक “मैं इंसान हूँ, कोई ख़बर नहीं” 11756 0 Hindi :: हिंदी
मैं इंसान हूँ, कोई ख़बर नहीं, जो रोज़ बहे और चैनल बने। मेरी ख़ामोशी की चीख़ें भी, भीड़ में जाकर पोस्टर बने। मैं रोटी नहीं, मैं सपना हूँ, जिसे भूख ने हर दिन चबाया है, मैं वो सवाल हूँ ज़माने से, जिसका जवाब कभी नहीं आया है। मेरे हाथों में छाले नहीं, ये मेरी मेहनत के हस्ताक्षर हैं, मेरी आँखों में जो आग जली, वो हार के खिलाफ़ साज़िशें हैं। मैं झुका नहीं हूँ हालात से, मैं बस तूफ़ानों से सीख रहा हूँ, जो मुझे मिटाने आए थे, उनके नाम से मैं लिख रहा हूँ। मैं धर्म नहीं, मैं दर्द हूँ, जो हर मज़हब में बँट जाता है, मैं वो बच्चा हूँ फुटपाथ का, जो हर शहर में मर जाता है। पर सुन ऐ दुनिया, ध्यान रख, मैं मिट्टी हूँ, इतिहास बनूँगा, जो आज मुझे पैरों से कुचले, कल उसी की पहचान बनूँगा। मैं शोर नहीं, मैं सोच हूँ, जो सदियों बाद भी गूंजेगी, मैं वो कहानी हूँ वक़्त की, जो हर जुबां पर फिर पूछी जाएगी। क्योंकि मैं इंसान हूँ, कोई ख़बर नहीं— मैं आने वाला कल हूँ, जो आज लिखा जा रहा है।