शरद भूषण मोंगरा 24 Apr 2026 शायरी समाजिक 3391 0 Hindi :: हिंदी
मुसलसल जिंदगी बहती चली नदी के वेग सी कोई परिंदा दरख़्त पर बैठा हुआ मुझको देखता है मैं किसी कीड़े की भांति पत्ते पर बैठा किनारा खोजता हूं ताबड़तोड़ लग रहे हैं कई हिचकोले यूं लगता है कि जिंदगी अगले पल खत्म है कि फिर से शांत लहरें मेरा मनोबल बढ़ा कर मुझे फिर झोंक देती हैं अधर के इस भंवर में बरबस आह निकलती है जगत के मालिक के लिए तभी झोंका कोई मुझे पत्ते पर उड़ाकर निकाल फेंकता है उस भंवर उस वेग से बाहर। लेखक शरद भूषण मोंगरा