MUKESH KUMAR DHODHAWAT 01 Aug 2025 कविताएँ अन्य # यूं ही में घूमने निकल जाता हूं ऊब जाता हूं अपने आप से तो घर से निकल जाता हूं 9536 0 Hindi :: हिंदी
यू ही में कभी घूमने निकल जाता हू ऊब जाता हू अपने आप से तो घर से निकल जाता हूं सफर करता हूं बस में तो नईं बात संजो लेता हूं ओर देखने जा रहा हूं उस दृश्य को जो मेरे लिए अनजाना है में उसको सर्च कर लेता हूं बीच सफर बस में बुजुर्गाने दिन को सीट ऑफर करता हूं मिले जो खुशियां उसको माथे पर रख लेता हूं घूमता हूँ इस तरह से जैसे मे अकेला हूं जीवन सिर्फ पल है एक खुशी का में इसको जी लेता हूं समझ नहीं आता में वहां क्या करने जाता हू बस यूं ही में घूमने निकल जाता हूं.... निकला था सालों पहले ऐसी ही एक तलाश में सोचा था कोई पेड़ मिलेगा सोचा था कोई घर मिलेगा सोचा था कोई ठंडी छांव होगी मेरे लिए पर हुआ ना कुछ ऐसा जैसा मैने सोचा नए कि तलाश में भूल गया था वो पतली गांव की गलियां निराश किया सफर ने मुझे में कही भी क्या करने जाता हूं बस यूं ही में कभी घूमने निकल जाता हूं.... सफर ए जिंदगानी में मैने खूब दोस्त बनाए हैं जो किसी काम के नहीं मैने कविता में ऐसे लतीफे गाए है काश मैं जान पाता इस सफर की आखरी मंजिल तो में यहां क्या करने आता हु बस यूं ही में घूमने निकल जाता हूं ऊब जाता हूं..... मुकेश कुमार धोधावत 7726075950