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विरह वसंत

Kishor Kumar Bhardwaj 23 Jan 2026 कविताएँ अन्य विरह वसंत 6752 0 Hindi :: हिंदी

रोती फिरती राधिका अजहु श्याम ना आए।
विरह अगन में तप रही मोहे ऋतुराज ना भाये।।

पीत वर्ण काया भयी कंचन के रंग सी।
आंखों में है लालिमा ज्यों ढलते सूरज सी।
बातें बहकी बहकी है ज्यों बसंती हवाएं।
रोती फिरती राधिका....

फूले सरसों खेत में कोयल गीत सुनाए। 
मंद मंद बहती पवन तन में अगन लगाए।
हृदय में विरह की वेदना ऊपर से मुस्काए।
रोती फिरती राधिका..

करती मैं स्वागत तेरा हे ऋतुराज बसंत। 
मेरे घर पर भी अगर आ जाते मेरे कंत।
विरह वेदना यो बड़ी घर अंगना ना सुहाए।
रोती फिरती राधिका...

"श्री"मन बावरी हो गई रटते श्याम ही श्याम। 
ना जाने किते प्रेम में उलझे है घनश्याम। 
निष्ठुर ऐसे हो गए कान्हा प्रीत मेरी बिसराए। 

रोती फिरती राधिका अजहु श्याम ना आए।
विरह अगन में तप रही मोहे ऋतुराज ना भाये।।

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