Rambriksh Bahadurpuri 28 Jun 2025 कविताएँ समाजिक #व्यंग्य #हास्य कविता #रामवृक्ष बहादुरपुरी #अम्बेडकरनगर पोइट्री # 16291 0 Hindi :: हिंदी
दूसरों पर हंसते हो कहता हूॅं एक बात,भले जो न अच्छा हो पर शायद यह बात सोलह आना सच्चा हो होता है जब सफल कोई बढ़ जाता आगे न जानी फिर क्यों निशाना हर कोई साधे काना फूसी कान कान हर कोई करता अरे! गया अब बदल बात कोई न सुनता गजब रीति है बनी मनुष्य के अपने मन का देख सके न सफल होत बढ़ते भी धन का नजर न आता त्याग तपस्या मेहनत सारा कहत फिरै चहुंओर बुराई करते खारा पढ़ लिख कर क्या कौन गंवाया कितना होगा? खुद सोचों धन समय गंवाया उतना होगा! समय-समय पर कर्ज मर्ज से लदा लगाया कैसे जीवन वस बिताया अपना होगा सफल हुआ यदि नहीं कहीं तो दो कौड़ी का हंस हंस कर उपहास उड़ाया कितना होगा उल्टा अपने लोग कोसते कब थकते हैं कोस कोस कर नर्क भेजते वे रहते हैं धन्य है मानव सोंच कहां तक तुम रखते हो अपने को न देख दूसरों पर हंसते हो। रचनाकार रामवृक्ष बहादुरपुरी अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश 9721244478
I am Rambriksh Bahadurpuri,from Ambedkar Nagar UP I am a teacher I like to write poem and I wrote ma...