Ratan kirtaniya 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य प्रेम बिना जग अधूरा सूनापन लगता है । 106502 0 Hindi :: हिंदी
मेरे हृदय में तेरे धाम रे प्रियतमा !
हृदय में बस के -
निर्दयी तू हँस के ;
हृदय मेरा बिखर दिया -
करके चूर - चूर ,
हृदय की रूधिर बना अत्रुनीर ;
नयन से बहे निर्झर झर - झर ,
तन ज्यों रहा निष्प्राण बनकर ।
कवि बन के पंक्ति मैं लिखता हूँ -
बंजर हृदय बाग में -
स्वपनों की पुष्प खिलाता हूँ ,
तेरी आग में -
जल रही बाग में ;
जलता हुआ चुपचाप मैं दिखता हूँ ,
जल गया सब कुछ ;
रहा नहीं जीवन में और कुछ ;
काँटें अवशेष और नहीं कुछ ,
तुम ही तो थे पुष्प मन की -
जो कभी खिली नहीं ;
तू अधूरा अभिलाषा जीवन की ,
ना देख ले कोई -
चोरी - चुपके मैं रोता हूँ ।
इस जीवन की डाली ;
श्रावण में झड़ गये -
हो गये सब खाली ,
कूल में नहीं कोई शोरगुल -
आज सूख गया हृदय फूल ,
रे विहंगिनी ! ना तेरी कोई कीर्तन ;
दहन बाकी है काया छोड़ गया प्राण ,
सूखी डाली पे नहीं आती -
विहंग गोरा हो या काली ;
अंतका अभिलाषा -
हे प्रियतमा ! मैं तेरा दर्शन का प्यासा ।
देख के तेरा रूप मोहिनी ;
वहीं से शुरू हृदय की कहानी ,
चला के चकित - चाल ,
प्रेम मेरा नव पल्लवित पल ;
नादान हृदय समझा नहीं तेरी चाल ,
हृदय को हृदय से बंँधा -
बिछा के प्रेम की आँचल ,
काट नहीं पाया माया जाल ,
हृदय से हृदय को लूटा ;
माझी बीच धार में नाव को डूबाया ,
बचा कौन सी हर्ष - उल्लास ;
जलधि में डूबके -
हृदय को क्यों है ? तेरी प्यास ।
हृदय को हृदय में करके विलीन -
जलती - बुझती अभिलाषा -
कूल के श्याम तृण सूखी ;
निर्दयी आज पुलिन ;
मेरे निच्छ्वास - उच्छवास में -
प्रियतमा ! तेरी खुशबू ;
मेरी हृदय में तेरी बास ,
जहाँ हम दोनों बैठे करते थे -
आज अकेला बैठा हूँ -
होकर उदास ।
कहाँ है जीवन की निरूपमा ;
हृदय से हो अलक्षित -
मेरे हे प्रियतमा !
तुम ही मेरे आत्मा के परमात्मा ,
कौन सी धारा में बहा दिवा - निशा -
ठहराव कहाँ कौन सी दिशा ,
मूर्ख हृदय को क्यों ?
तेरी प्रेम की नशा ,
अलक्षित हूँ सब से ;
प्रेम बंधन में बंधा हूँ तब से ,
बंध गई पाश -
जल गया कूल में ;
पुलिन में रहा ना श्याम घास ,
रे प्रियतमा ! कूल में बैठा है -
कवि का हृदय उदास ।
रतन किर्तनिया
छत्तीसगढ़
मो 9343698231