Jyoti yadav 06 Aug 2023 कविताएँ समाजिक बदलती दौर में मानवता कहीं छूट रही है 27004 0 Hindi :: हिंदी
🌹🌹🌹🌹मानवता कहीं छुट रही है
डोर रिश्तों की अब टूट रहीं हैं
हर किसी को 💯💯अपनी अपनी पड़ी है
समझ नहीं आता कैसी घड़ी है🙏🙏🙏
🥀🥀🥀छोड़ दया, धर्म ,रिति
,रिवाज ,संस्कारों को
दौड़ते रहना पैसे के पिछे 🥀🥀🥀
क्या यही आधुनिकता है
समझाओ जरा बदलते दौर की।
क्या यही सफलता है🥀🥀🥀
बदलना जरूरी है माना👌👌
पर क्या इस तरह का बदलाव💐
💯जहां ताना बाना और इस तरह का खिंचाव
सुनता नहीं कोई किसी का सुझाव
क्या यही है बदलते दौर का लगाव💐💐💐💐
सोच बदलो उम्मीद बदलो🙏🙏🙏
तरक्की के लिए तरकीब बदलो
मानवता ना बदलो तुम
रखो ख्याल एक दुजे का मुहब्बत से
बदल दो फिजा बदलते दौर की जन्नत की
🌹🌹🌹🌹🙏
( ज्योति यादव के कलम से )✍️
( कोटिसा विक्रमपुर ,
सैदपुर गाजीपुर 🙏🌹)