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श्री राम-भ्रमित मन कि व्याकुलता देख

Raj Ashok 08 Jan 2024 कविताएँ धार्मिक श्री राम 40813 0 Hindi :: हिंदी

भ्रमित मन कि व्याकुलता ,
देख ,
सिय , हट जाना क्या ? 
अभी वनवासी है। 
मर्यादा ,पुरूषोत्म श्री राम 
देख, 
हर एक ,वचन, 
पर्णय का आज निभाना  क्या ? 
संघ्या कि वेला मे, एक घुन्घली सी
बहुत दुर स्वर्ण मंर्ग की वो आभा 
देख, 
सिय,मन का. ललचना क्या ? 
इच्छा ,हिय से सुन सिय की
राम का वन मे घंनुष उठाना क्या ? 
देख,
प्रेम ,पत्ति-पत्नी का  है। ये
प्रसन्नता से खिलखिलाना क्या  ?
देख,
 एक पहला ही उपहार तो मांगा ।
आज सिया ने आश्चर्यचित हो जाना क्या? 
देख,
आज नहीं तो कल कभी आना क्या ? 
लक्ष्मन,
तुम रूको अभी हम शिकार पे 
जाते है।
अभिलाषा सिय की है।
तो ओर कर्म निभाना क्या ?

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