Ratan kirtaniya 08 May 2023 कविताएँ समाजिक सुबह का नज़ारा का बात ही कुछ अलग है उसी विषय में लेख है। 34502 0 Hindi :: हिंदी
लगा के तन मन कर रही कीर्तन -
टहनी - टहनी पे नाच कर ;
जग - जीवन में विहंगिनी महान ,
राग - अनुराग में लिप्त ,
भागी तिमिर -
चमक उठी नील गगन -
पुलकित हैं सब का मन ,
जलद को चीरकर कभी ;
जग को उज्ज्वल किया रवि ,
उज्ज्वल हुई सब की जीवन -
अलौकिक नील गगन ;
मृदु - मृदु बहती पवन ;
लगा के मन प्राण -
हे विहंगिनी ! तेरे कोमल हृदय में -
कौन लिखा गीत ?
किसने बंधा संगीत ?
गा रही हैं ऐसी गान ;
सुन के धन्य हुआ जीवन ।
जगती हे दिनकर !
मेरे कलुष उर तपाकर ;
अकलुष कर ,
रसूल तू बन -
संसृति को तपा -
अरुप - स्वरुप बन ।
पत्र लाया पूरब दिशा में -
कोई जाग गया ;
कोई हैं तंद्रिक नशा में ,
हो गया भोर -
और मत सो काम चोर
बहा में अमृत घोला है -
अलौकिक दृश्य -
छ : ऋतु में पहली किरण -
भाँति -भाँति खेला हैं ,
विहंगिनी राग -
बेजान में आ गई जान ।
हवा में पुष्प गंद -
दसों दिशाओं में बह रही -
महाकवियों के छंद ;
जीव - निर्जीव उस की पाश में ,
सोना बन के चमक रही तुहिन -
सुन्दर सुबह के घास में ।
सुबह में जाग रहे जंगली हाथी -
जाग रहे उसके सारे साथी ;
जंगली मुर्ग - मुर्गी और तीतर -
सब जाग रहे जो हैं वन के भीतर ,
मकड़ी करती अपने कर्म की श्रीगणेश -
बिछा रही अपनी जाल -
आहार श्रृंखला का चक्रव्यूह होता -
सुन्दर सुबह से श्रीगणेश होता -
सब श्रृंखला में धुन हैं ,
सुबह का का गुण - अवगुण है ।
जलवान में खिला सरोज ;
सुन्दर सुबह की कीर्तन -
करते भौंरा उस में रोज ,
रवि के लिए -
विहंगिनी पंक्ति बन गई माला -
देख के पहली उज्ज्वल ,
लहरों की लपटों में स्वर्ण चमके ;
अब मत सो जाग के देखों -
स्वर्ग से भी सुन्दर लगता -
सुन्दर सुबह में वसुन्धरा ;
सुन्दर सुबह यही कविता हमारा ।
कवि रतन किर्तनिया
छत्तीसगढ़
जिला :- कांकेर