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रिस्ते

Rupesh Singh Lostom 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य रिस्ते 49636 0 Hindi :: हिंदी

रिवाज़ बदलते गए 
रिस्ते टुटते गए 
जो अपने हमारे थे 
वो सब बिछड़ते गए
हमने जब भी कोशीश कि 
उन लम्हों को 
समेटने की 
तब तक रिस्ते बदल गए
न गवारा था उनको 
हम से दुर जाना 
वो अतीत समझ 
हमको भुलते गये 
था ठोकर हमारे हिस्से मे 
जमाने की 
तभी तो अपने भी हम से  
दामन छुड़ाते गये 
जिन को चाहा था हमने 
उस खुदा के बाद 
आज भी हम से 
हाथ छुड़ा के गये 
अगर शिकायत थी हम से 
तो मोहब्बत भी था 
फिर क्यो हर वक्त 
वो मुकरते गए

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