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रणभेरी: आज का धर्मयुद्ध

Anilkumar Rathwa (Sameer) 11 Feb 2026 कविताएँ समाजिक रणभेरी: आज का धर्मयुद्ध 8141 0 Hindi :: हिंदी

उठो कि अब विश्राम नहीं,
रुकना तेरा काम नहीं।
समय की धारा को मोड़ दे तू,
हर पुरानी बेड़ियाँ तोड़ दे तू।

​न हार का गम, न जीत का मोह,
बस कर्म में जलता एक विद्रोह।

​चक्रव्यूह ये दुनिया रचेगी,
हर डगर पर बाधाएँ सजेंगी।
पर तू अपनी जिद्द का गांडीव उठा,
लक्ष्य की आँखों में आँखें मिला।

​चल टूट पड़े ऐसे रण में,
ना मृत्यु का हो भय मन में।
जीते तो अर्जुन कहलाएं,
हारे तो अभिमन्यु सा जीवन में॥

​पसीने को अपनी स्याही बना,
संघर्ष को अपनी गवाही बना।
इतिहास वही जो खुद को खपा दे,
शून्य से जो शिखर तक का रास्ता बना दे।

​कायरों की भीड़ में मत तू खोना,
विपत्ति में भी मत तू रोना।
तेरा साहस ही तेरी पहचान है,
तेरा पौरुष ही तेरा सम्मान है।

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