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पथ और पथिक: एक पलयानी पीड़ा

Pradeep singh " gwalya " 30 Aug 2025 कविताएँ दुःखद Psdrishti.Blogspot.Com 11197 0 Hindi :: हिंदी

ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 


नुकीले काँटों ने पत्थरों के बीच जगह बना ली है
उसमें हरी घास रास्ता छुपा रही है
चाह नहीं मेरी, मेहमान दुखी जाये
राह के कीट उसे सताये
इन कोमल पैरों को जरा संभलकर उठाना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

जिस मिट्टी की लोग मिसाल दिया करते थे
वो आज नरम पड़ी है
वही मिट्टी किसी बटोही को तरस पड़ी है
रात चाँद दिन सूरज के सिवा कुछ दिखता नहीं
आज कोई दिखा है तो अपना परिचय देते जाना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

खिदमत की जिनकी वो तो आज भूल गये
इंतजार उनका परंतु आ तुम गये
कोशिश पूरी रहेगी तुम्हें
 मंजिल दिखाने में
पर बदमाश मौसम का कुछ कह नहीं सकता। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

मंजिल को अगर तुम चले हो तो
कामनाशक्ति न बदलना
परस्थिति कठिन देख पीछे न मुड़ना
क्योंकि कंटीली झड़ियाँ मुझे अदृश्य कर रही हैं
वो अभिमानी हैं तो क्या न कभी कमतर आंकना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

हिमपात हो या सूर्यताप 
न भेदभाव किया ना किसी का किया जाप
तटस्थ रहा हूँ जब से बना हूँ
साथ में तुम भी ये सीख बटोरे ले जाना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

न लोभ न लालच
न बुनता कोई ताना बाना
मैं तो धरोहर भी नहीं हूँ ऐ पथिक
मध्यस्थ हूँ मैं दो क्षितिज का 
तो मन अवधारण रखना, यूँ न मुझे भुलाना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना।। 

बहुत लालायित था किसी के आहट के लिए
तुम्हारे आने से मन को शांति मिली है
अब तो इंतजार है उस दिन का
जब हर वो साथी आयेगा, चलते चलते गीत गुनगुनायेगा
बस ये दिली इच्छा मेरी उनको बताना। 
ऐ राह के बटोही खबरदार रहना
बरसों से जनशून्य हूँ जरा संभलना ।। 

                           ✒प्रदीप सिंह "ग्वल्या

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