Anilkumar Rathwa (Sameer) 03 Sep 2025 कविताएँ अन्य "पिता के पसीने की खुशबू" 11711 0 Hindi :: हिंदी
आज जो हम महके–महके कपड़े पहनते हैं, भीड़ में आत्मविश्वास से चलते हैं, हाथ में मोबाइल, आँखों में सपने, ओंठों पर हँसी सजाए रहते हैं… असल में यह हमारी नहीं, हमारे पिता के पसीने की खुशबू है। --- वो पसीना कभी खेतों की मिट्टी में बहा, कभी ईंट–गारे के धूल में सना, कभी फैक्ट्री की गर्म भट्ठियों में टपका, तो कभी ठेले की मेहनत पर चमका। उस पसीने से भीगा उनका कुर्ता, आज हमारे लिए सम्मान का वस्त्र बना। --- हमारे जूते की चमक उनके नंगे पैरों की छालों से आई, हमारे घर की ठंडी छाँव उनकी धूप में झुलसी देह से बनी। हमारे होठों की हँसी उनकी नींद रहित रातों से उपजी। --- लोग पूछते हैं – ये कैसी महक है जो हमारे साथ चलती है? हम मुस्कुराकर कहते हैं – ये हमारे पिता के पसीने की खुशबू है। --- पिता का पसीना केवल पसीना नहीं, वह तप है, त्याग है, तपस्या है। वह हमारे सपनों का बीज है, हमारे भविष्य की मिट्टी की नमी है। --- जब-जब हम जीवन में महकेंगे, याद रखना – उस महक की जड़ें हमारे पिता की थकी हथेलियों में छुपी हैं।