Ratan kirtaniya 05 Jun 2024 कविताएँ अन्य प्रकृति प्रेम , जंगल में एकांत बैठने से प्रकृति और जीव पंछी के आवाज लुभा लेते है मानो यही पर आत्मा और परमात्मा का मिलन हो रहा है । 44524 0 Hindi :: हिंदी
मेरा आत्मा प्रकृति में समाया -
द्रुमों के मृदु - छाया ,
कुकू - कुकू कोयल बुलाया ,
तो कहीं विहंगिनी ने -
जीवन की अनमोल गीत सुनाया ।
छायावाद ने माया जाल बिछाया -
प्रकृति प्रेम ने -
माया जाल में फंस लिया ,
करूँ प्रकृति की भक्ति -
दे वरदान , दे प्रभु शक्ति ।
प्रकृति मेरी माँ -
द्रुमों की छाया ;
पिता श्री का छत्रछाया ,
आत्मा से आत्मीयता जोड़ा हूँ ,
इसे कैसे तोड़ूँ ,
सुन के थमता ,
निच्छ्वास - उच्छवास ;
सुन के कोयल की मीठी बोल ,
कहीं सुना विहंगिनी की -
तो गुणगुण करते मधुकर की वीणा अनमोल ,
कौन गीतकार ?
कौन संगीतकार ?
कौन है इस प्रकृति की रचानाकार ,
प्रकृति लुभाएं मन - प्राण ,
प्रकृति को मेरा कोटि - कोटि प्रणाम ।
मरणोपरांत मेरा आत्मा ,
प्रकृति की गोद में -
विलय हो जाए -
यहीं अभिलाषा मेरा ,
मर के अगर जन्म लूँ दोबारा ,
विहंगिनी की कोमल उर में -
लिखा गीत हो मेरा ।
प्रकृति की गोद में बहती -
नदी - नद , नाल के जल अमृत ,
इसे पी के करूँ -
प्यासा आत्मा को तृप्त ।
रतन किर्तनिया
पखांजूर
जिला :- कांकेर
छत्तीसगढ़