Vipin Bansal 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक #नियति 45224 0 Hindi :: हिंदी
नियति का न कोंई तोड़ !
नियति जब खोले पोल !!
हवस की गठरी भर नहीं पाए !
कर्म की लेखी मिट नहीं पाए !!
कर्म के जैसे बीज लगाए !
फूट के वो ही बाहर आए !!
कुदरत का न इसमें रोल !
तेरे कर्मों का ही मोल !!
वक्त ए तराजू की है तोल !
इसमे न है कोंई झोल !!
नियति का न कोंई तोड़ !
नियति जब खोले पोल !!
सौंदर्य प्रकृति का हमने बिगाड़ा !
गंगा जल में जहर है डाला !!
नदियों का आकार घटाया !
वनों को हमने बौना बनाया !!
कुदरत का किया उपहास !
अपने कर्मों की है मार !!
कुदरत का न इसमें दोष !
हमने खो दिए अपने होश !!
हमारे गुनाह रहे हैं बोल !
अब तो अपनी आँखे खोल !!
नियति का न कोंई तोड़ !
नियति जब खोले पोल !!
विपिन बंसल