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नव-निर्माण-मार्ग दर्शक माता-पिता

Raj Ashok 11 Jun 2023 कविताएँ समाजिक निर्माण 35494 0 Hindi :: हिंदी

रौशनदानो की रोशनी मे, 
ये बड़ी -बड़ी किताबों मे
अपना भविष्य डुढ़ते ।
नौजवान ....... 
मार्ग दर्शक, माता-पिता 
अपने स्वप्न  जोड़ के देख रहे है।
उजालों की रोशनी कहीं 
इन नन्हे-नन्हे  हाथो मे ,
पकडी़ ऊमीद की 
ये मशाले ,मन्द ना पड़ जाऐ। 
एक रोज ,क्या  ?
ये हर रोज ,युही ऊमीदों का सवेरा इन्हे 
जगाता है।  इतनी मेहनत 
के बाद भी,  
अपना भारत क्या पाता है ?
विवशता, बेबशी मजबुरी,
बेरोजगारो की
यहाँ  हर एक  सुबहाँ । 
सपने ,दिखाने वाले ही 
अक्सर,यहाँ भष्टाचार के साथी है। 
सच, तो है। ये के
सच, को समझता कौन  नहीं ।
पर क्या ? 
वक्त यहाँ पर मौन नहीं
अभी ओर मेहनत करनी है। 
अभी, तो प्राण  बाकी है। 
मेरे देश का नव निर्माण तो बाकी है।

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