akhilesh Shrivastava 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक आज के समय में आम आदमी की अभिव्यक्ति मुझको समय नहीं है 60866 0 Hindi :: हिंदी
*कविता *
* मुझको समय नहीं है *
अब जिंदगी की कैसी, रफ़्तार बढ़ रही है |
हर कोई कह रहा है, मुझको समय नहीं है |
बचपन के दिन हमारे थे कितने प्यारे प्यारे |
पैदल और साईकिल ही, तब साधन थे हमारे ।
उस धीमी जिंदगी में, समय की कमी नहीं थी |
था सुकून जिंदगी में, बस खुशी ही खुशी थी |
उन दिनों हमें पढ़ाईं का, कोई टेंशन नहीं था |
हर छात्र पर शिक्षक का ध्यान केंद्रित था |
कोचिंग का उन दिनों में, कोई चलन नहीं था |
हमें आज भी है याद, उन दिनों जो पढ़ा था |
उन दिनों खेलने का, हमें समय भी बहुत था |
छोटे छोटे घरों में, सब मिलकर रह रहे थे |
एक ही की कमाई में, सब लोग पल रहे थे |
अब घर में सब कमाते, फिर भी कमी बनी है |
माँ - बाप के लिए, अब घर मे जगह नहीं है |
अब बच्चों को खेलने का समय ही नहीं है ।
नित नए पेटर्न में, अब शिक्षा बदल रही है |
बच्चों की शिक्षा घर घर में टेंशन दे रही है |
ऑनलाइन शिक्षा की, अब रफ़्तार बढ़ रही है ।
मोबाइल से सभी की जिंदगी बदल रही है।
अब आपसी रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं ।
अब अपनों के लिए, किसी को समय नही है ।
अपनों से दूर रहकर, दूजों से निभ रही है |
अब जिंदगी की कैसी, रफ्तार बढ़ रही है ।
हर कोई कह रहा है, मुझको समय नहीं है |
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