Amit Tiwari 27 Jan 2025 कविताएँ धार्मिक #धर्म #समाज #पैसा 34025 0 Hindi :: हिंदी
तुम व्याकुल हो उस काया की कल्पना से जो कालिमा की काली घटा से भी काली है तुम ढूंढ रहे हो , भाग रहे हो उस मनवांछित फल के लिए तुमको लगता है, तुम्हारे उस चंद चावल के दानों के लिए वो पत्थर की मूर्ति वो काम करेगी जो छपन भोग की प्यासी है मुझे लगता है तुम नादान हो , ना समझ हो जो इस कलयुग में पैसों का मोल नहीं समझते तुम्हारा वो स्वामी , भी आदि हो चुका है उस आराम का , जो उसे पैसे वालो की कोठरी में मिल रही है तुम्हारे उस कुटिया में कहा वो छपन भोग जिसका लोभी हो चुका है तुम्हारा स्वामी अमीरों ने खरीद लिया है सारे मंदिर आपस में बाट लिया है तुम्हारे स्वामी को अब वो कहा रह गये तुम्हारे स्वामी तुम्हारे मंदिरों में सिर्फ घड़ियाल रह गए है जिको सुनने के लिए कोई भी नहीं है और तुम्हारे पूजनीय मेवा मिश्री खा रहे है कोठरी में बैठ कर