Abhishek Mishra 09 Nov 2025 कविताएँ देश-प्रेम Mitti Ka Sandesh, Desh Bhakti Kavita, Abhishek Mishra Poem, मिट्टी का संदेश 9913 0 Hindi :: हिंदी
मैं उस मिट्टी की बात करूँ, जो हर जन्म की पहली धड़कन है, जो आँसुओं से भीगकर हँसती है, और लहू से रंगकर भी महकती है। वो मिट्टी — जिसने राम के वन देखे, कृष्ण की बाँसुरी सुनी, बुद्ध के मौन को समझा, और गाँधी की आह को जिया। आज वही मिट्टी मुझसे बोली — “कवि, तू अब भी क्यों चुप है? तेरे देश में शब्द बहुत हैं, पर भावना अब कम है।” मैंने कहा — “माँ, मैं लिखता हूँ तेरे गीत।” वो बोली — “गीत नहीं चाहिए अब मुझे, अब क्रंदन को भी शब्द दे। कविता नहीं — एक जागृति चाहिए मुझे।” “तू लिख उस किसान की हथेली का पथरा गया पसीना, उस माँ की सूनी चूड़ी की आवाज़, उस सिपाही की मिट्टी–सी देह, जो लौटकर भी लौट नहीं पाया।” “तू लिख उन सपनों की चिताएँ, जो विकास के नारे में जल गईं, और उन बच्चों की मुस्कानें, जो भूख में खो गईं।” मैं काँप उठा... उस मिट्टी की आवाज़ में इतिहास की पीड़ा भी थी, और भविष्य की प्रार्थना भी। वो बोली — “मैं वही मिट्टी हूँ, कवि, जो तेरे पाँवों तले भीगती रही, तेरे शब्दों में जागती रही, और तेरे मौन में मरती रही।” “मुझे अब स्मारक नहीं चाहिए, मुझे संवेदना चाहिए। मुझे शौर्यगान नहीं, मुझे इंसान चाहिए।” मैंने अपने हाथों में उस मिट्टी को थामा, वो गीली थी — आँसुओं से नहीं, बल्कि उम्मीद से। वो बोली — “मुझमें तेरी जड़ें हैं, कवि, मुझसे ही तेरा अस्तित्व है। अगर तू मुझे भूल गया — तो इतिहास तुझे याद नहीं करेगा।” “लिख वो भारत जो केवल देश नहीं — एक भावना है, एक ऐसी मिट्टी — जो अब भी बोलती है।” और जाते–जाते वो फुसफुसाई — “जब तक तेरी कलम सत्य बोलेगी, मैं जीवित रहूँगी। और जिस दिन शब्द बिकने लगेंगे... मैं स्वयं — राख बन जाऊँगी!”