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मेरी प्रेयसी रूपवती नार। हेमराज सुमन द्वारा रचित कविता।

Hemraj suman 19 Jun 2025 कविताएँ प्यार-महोब्बत कृष्णा, प्रेम, सरिता, प्रेमग्रंथ, शीतल, संगीत , सम्मान,, स्वाभिमान, गागर, सागर, भावना, अनन्त, आलिंगन, पायल, मुस्कान,चकोरी, रूप की कटोरी, झरना, भावना, अनन्त,आलिंगन बेमिसाल, मोहिनी, प्रेमग्रंथ, शीतल, चकोरी रूप 15396 0 Hindi :: हिंदी

मेरी प्रेयसी तुम चटोरी हो,चांद चकोरी हो,रूप की कटोरी हो।
सोचता हूं एकांत में बैठकर, तुम बंगाली या राजस्थानी छोरी हो।
रूप का खजाना है तू वास्तविक स्वरूप में "सोच ही रहा था मैं कि मन बोल उठा,तुम तो मेरी गणगौरी हो।।

तेरी आकर्षित आंखों में प्रेम भावना का सागर है।
अपना आलिंगन तो बस उस सागर की इक गागर है।
सादगी बेमिसाल है, मोहिनी सूरत, अखंड प्रेम की मूरत हो"
मैं छोटा सा अंश हूं उसका बसा जो तेरे मन में गिरधर नागर है।।

तुम हो प्रेमग्रंथ सी में टूटा सा छंद हुं।
दो राहों में चलने वाला में खुद में अन्तर्द्वंद हूं।
प्रेम पवित्रता, अस्मिता को हमने मिलकर समझा है"
यद्यपि प्रेम तो ऐसा है तुम पुष्प हो और मैं सुगंध हूं।।

व्यक्तित्व तुम्हारा जैसे कि इक
शीतल सरिता सी काया हो।
चेहरे की चमक से लगता है तुम इक वरदानी माया हो।
संगीत विराजित कंठ तेरे ,हर बोल सुरों सा लगता है "
जब सुर की साधना करती हो,
प्रतीत मुझे ये होता है कि मां वीणापाणी की छाया हो।।

जब सेवा भाव में होती हो तुम सबको मां सी लगती हो।
रोगी को निरोगी करने का हर जतन भाव से करती हो।
कोई हार जाए गर हिम्मत तुम उसको संघर्ष दिखाती हो"
है रूप तेरे में शक्ति का,
विपदाओं से लड़ने का पल में मंत्र सिखाती हो।।

तुम धार हो तलवार हो।
स्वाभिमान का सार हो।
इक सागर सी अपार हो।
दोषी के लिए मझधार हो।
मेरी नजरों से देखू तो तुम रूपवती सी नार हो।।

तेरी पायल की आवाज लगे जैसे कि सुंदर झरना है।
कर्तव्यनिष्ठ तुम ऐसी हो जैसे तुमको सब करना है।
सहनशीलता ऐसी की तुम अपने आप में वसुधा हो"
तेरी नजरों का लक्ष्य यही हर मन को सुख से भरना है।।

तुम वैर भाव नहीं लेती हो हर कोई को खुशियां देती हो।
चेहरे की झलक से लगती हो जैसे लहलाती खेती हो।
तू सत्य वचन पर अडिग रहे तेरा यही स्वाभिमान है "
लाखों शिकवो को मिटाना हो तो तुम इक मुस्कान ही लेती हो।।

तेरी आंखों की रेखा में मैने प्रेम तृष्णा को देखा है।
मन में चंचल ही , उत्सुक सी इक मृगा को देखा है।
हर बार समागम होने को इक चाह शरारत करती है"
संजोग मिलन की पूर्णता को मन में कृष्णा को देखा है।।

तेरा प्रेम अनन्त सा लगता है मैं तो गागर भरता रहूं।
ये शब्द मुझे कम लगते है तारीफें यूं ही गढ़ता रहूं।
है धन्य पिता और माता वो ,धरती पर तुमको लाए है" 
मेरा मन उन्मुख प्रिय,उनको मैं नमन ही करता रहूं।।
रचनाकार- हेमराज सुमन

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