Umendra nirala 08 Mar 2025 कविताएँ अन्य 22081 0 Hindi :: हिंदी
( मेरा गाँव )
जहां वृक्ष खड़े हैं,झुककर
शुद्ध हवा उनकी स्वाभाव में
चाह उनमें इतना देने कि,
आदि से अंत सर्वस्व समर्पण।
वह गांव मेरा है।
मिट्टी की सोंधी खुशबू
शुद्ध कर दे अंतर्मन को
मिट्टी की उर्वरा आभार,
फसलों का मुस्कुराना पैदावर
वह गांव मेरा है।
नदियों की लहरें पवमान धरा सी
चांदनी की शीतल किरणे
यह दृश्य देख बिछड़ न पाएं,
चकवा-चकवी रात्रि संग हो
वह गांव मेरा है।
पर्वत भी सर झुकाये
करते है, बदल का स्वागत
वर्षा जल धरती का आलिंगन कर,
चारों तरफ हरियाली फैलाएं
वह गाँव मेरा है।
चाह कर भी विछड़ न पाउँ
मातृ रूप दीखता है, उसमें
सर्व सुखो कि अनुभूति करा दे,
वह गाँव मेरा है।