Anilkumar Rathwa (Sameer) 25 Sep 2025 कविताएँ अन्य “ममता का अमर बंधन” 35486 0 Hindi :: हिंदी
गोकुल की गलियों में जब, नन्हा श्याम माखन चुराता था। यशोदा की उँगली पकड़, हर ओर हँसी के दीप जलाता था। कभी झूठ-मूठ रूठ जाता, कभी गले लग रोने लगता। यशोदा के आँचल की छाया, उसके लिए जग का सुख बनता। हर सुबह राधा संग ग्वाल-बाल, गाय चराने निकल पड़ता। और लौट के जब घर आता, यशोदा का आँचल महक उठता। पर एक दिन समय ने दस्तक दी, धर्म की पुकार गूँज उठी। कंस का अन्याय मिटाने को, कृष्ण को मथुरा जाना पड़ा तभी। नंदगांव का हर आँगन रोया, गोपी-ग्वाल सभी भर लाए नयन। पर सबसे गहरी पीड़ा थी, यशोदा के हृदय में जलते पलन। “मत जा कान्हा, ओ मेरे लाल, तेरे बिना सूना है यह घर-आँगन। तू ही तो मेरी साँसों की डोरी, कैसे जीऊँगी तेरे बिन नंदन?” यशोदा ने आँचल थाम लिया, कृष्ण को गले से लगा लिया। आँसुओं से भीगते वक्ष पर, ममता का सागर छलक पिया। कृष्ण ने माता के चरण छुए, धीरे से बोला मधुर वचन— “माँ, यह वियोग कठिन है सचमुच, पर धर्म से बढ़कर नहीं है जीवन। कंस का अत्याचार मिटाना है, धरती को फिर सुखमय बनाना है। आपका आशीष संग होगा माँ, हर श्वास में आपका ही ठिकाना है।” यशोदा बस देखती रहीं, श्याम रथ पर चढ़ आगे बढ़ा। उनकी आँखों के दीप बुझ गए, ममता का आँचल सूना पड़ा। तब से यशोदा का हर दिन बीता, वियोग की अग्नि में जलते-जलते। पर हृदय में कान्हा सदा बसे, स्वप्नों में उनसे मिलते-मिलते।