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मातृभूमि की गरिमा-माँ भारती के आँचल मे

Raj Ashok 07 Jun 2023 कविताएँ देश-प्रेम मातृभूमि 36224 0 Hindi :: हिंदी

कलम ,को मजबूर कर दिया ।
आज,
किसी के दो कड़वे लब्जो ने। 
जो, कलम, 
कभी नगमे लिखा करती थी। मुहोबत के
वही कलम,
आज कोई  चिनगारी डुँढ़ रही है। 
काँन्ति के,
यों शोले ,भड़काने को 
भूल चुके, जो अपनी मातृभूमी की गरिमा 
उन्हें ,देशभक्त बनाने को 
स्वाभिमान ,स्वतन्त्र  नहीं है।
अब किसी मानसिक गुलामी  से
यहाँ जंजीरो  मे जकडी़ पड़ी है। 
परम्पराऐ । ,हमारी
ये संकल्प  है । अब
तैयार है हम  । अपना गौरव बचाने को, 
माँ, भारती के आँचल मे
रहकर देखे है ,
जो स्वप्न हमने, उज्जवल भविष्य के 
वही भविष्य ,अब बनना है। 
नीले अंबर से ,जब देखे ,ये दुनियाँ
हिमालय की चोटी पे 
ये एक छत्र, लहराता , नजर आऐ
तिरंगा हमारा, 
ये गर्व हर हिन्दुस्तानी
को दिल से महसूस कराना   है।

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