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माँ-जीवन का शुरू सफर अब है

Raj Ashok 13 Nov 2023 कविताएँ समाजिक माँ 47779 0 Hindi :: हिंदी

जीवन का .... शुरू ,सफर
अब है ......
पहला कदम, पहली ड़गर ....
अब है
सिख रहे है। चलाना ,योही ...
गिरते संभलते ।
नजरों के आगे ,जब अपनी  माँ रहती है।
चले। आवों ! तुम बैटा 
बस इतना हमेशा इतना कहती है। 
और, हम भुल जाते है।
हर ,डर   लड़खडाते कदमों का
दिल मे खोफ, नहीं रहता जरा भी  । 
चुनौतियों , को हम देते  फिर अलग चुनौती
बाज,के पंजो ,से हम शिकार छीन लाते। 
हमेशा माँ के आशीषो से, 
दीपक के जैसे ,
जीवन जग-मंग रहता । 
प्यार का  ऐसा ये एक नाता । 
कच्चे घागों से ये रिस्ता रभ बनाता  ।
पर एक निभाता, और एक भुल जाता । 
फिर बुलावा, कभी नहीं माँ का  आता।
अर्थ, क्या है ?
अब जीवन का, जब जीवन ही नीरस हो जाता। 
एक उमीद मे, 
कोई सो साल  जी जाता। 
माँ, के बुलाऐ बैटा क्यो नहीं आता।

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