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" मैं पैसा हूँ "

डॉ शिवम पांडेय 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक Google 54116 0 Hindi :: हिंदी

" मैं पैसा हूँ "

अरे ... मैं पैसा हूँ  रुपया बनाता हूँ,
लोगों को उनकी औकात बताता हूँ ,
ज़रा तुम उस पुराने गुल्लक को तो तोड़ो जिसमे मैं अशोक के अस्तित्व को कैद कर बैठा हूँ ,
क्योंकि मैं लोगों को उनकी औकात बताता हूँ ,
पर मुझे हर कोई अपने पास रखने से करता है इनकार ,
क्योंकि मैं पैसा हूँ ....,
और... तुमको है घमंड मेरी ही लक़बो से ,
क्योंकि अक्सर देखा है बुजुर्गों की सिर्फ बाते होती है रखना कोई नही चाहता ,
भले ही तुम्हारी नज़रो के तख्त-ए-आईने में मेरी कोई कीमत नहीं, 
अरे....मैं अगर कम हो जाऊ तुम्हारे 1 रुपये से तो अपनी कीमत बता दूँगा ,
लेकिन बाप कभी भी बेटे को अधूरा नहीं छोड़ता ,
ज़रा मेरी कीमत तुम पूछो उनसे जो मंदिरों के सामने मेरे लिए अपने आँचल फैला देते है ,
और शाम को मैं रोटी में बदल कर उनका कर्ज चुका देता हूँ ,
अरे... मैं पैसा हूँ रुपया बना देता हूँ .... रुपया बना देता हूँ
_"शिवम"_ 

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