Vipin Bansal 30 Mar 2023 कविताएँ धार्मिक #कला 100480 0 Hindi :: हिंदी
ए शारदा माँ झूठ बोलने की मुझे कला दे दो !
भेद सके न जिसको सच,ऐसा मुझे कवच दे दो !!
सच सुनने की अब, किसी को आदत नहीं ।
सच कहने की अब,जुबां में ताकत नहीं ||
सच कहा जिसने,उसकी सामत नहीं।
चेहरा बयां कर सके न सच,ऐसा मुझे मखौटा दे दो ॥
ए शारदा माँ झूठ बोलने की मुझे कला दे दो।
भेद सके न जिसको सच,ऐसा मुझे कवच दे दो ।।
खुद से कभी मिला ही नहीं,जिंदगी अपनी जिया ही नहीं !
खुद से हुई जब मुलाकात मेरी,खुद को समझने में हुई मुझसे देरी !!
जिंदगी अपनी जब भी जिया,प्यार के लिये तरसता रहा !
इस रंग मंच पर ठहर संकू,इस अदाकार को वो अदा दे दो !!
ए शारदा माँ झूठ बोलने की मुझे कला दे दो।
भेद सके न जिसको सच,ऐसा मुझे कवच दे दो !!
झूठ का बोलबाला सच का मुँह हो गया काला ।
झूठ, फरेब, और मक्कारी,आज के मानव की लाचारी ॥
तुन्हें क्यों दी फिर मुझको, जिंदगी ये बैमानी !
सच का जो रोग लगाया, इसकी मुझे दवा दे दो !!
ए शारदा माँ झूठ बोलने की मुझे कला दे दो।
भेद सके न जिसको सच,ऐसा मुझे कवच दे दो !!
विपिन बंसल