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खामोश पत्थर

Kishor Kumar Bhardwaj 03 Mar 2025 कविताएँ प्यार-महोब्बत 17698 0 Hindi :: हिंदी

घाट का एक ख़ामोश पत्थर हूँ मैं,
मैंने नदी के हज़ार नखरे देखे हैं…
कभी लहरों की हल्की छुवन,
तो कभी बाढ़ के ग़ुस्से देखे हैं…

कभी किसी ने थाम लिया मुट्ठी में,
कभी किसी ने ठोकर मार दी…
कभी किसी ने बना लिया पूजन का आधार,
तो कभी लहरों ने मुझे खुद से उतार दी…

पर तुम जब भी इस घाट पर आई,
लहरों का रूप बदला हुआ था…
हवा में कुछ मीठापन घुला हुआ था,
मानो समय भी ठहरा हुआ था…

तुमने अनजाने में मुझे छुआ था,
और मैं भीग उठा था एहसासों में…
नदी ने भी लहरों से गीत गाया,
तुम्हारे उन प्यारे उजासों में…

अब भी वही पत्थर हूँ घाट का,
मगर दिल में हलचल सी होती है…
जब भी तुम आती हो लहरों संग,
एक नयी रौशनी सी होती है…

तुम समझ सको तो समझ लेना,
ये पत्थर भी धड़कता है…
तुमसे कुछ कहता नहीं,
पर हर आहट पर चौंकता है…

अगर कभी हाथों में उठा सको,
तो बस रख लेना संभालकर…
क्योंकि इस खामोश पत्थर ने,
तुम्हारे हर नखरे देखे हैं…!

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