Anilkumar Rathwa (Sameer) 13 Aug 2025 कविताएँ अन्य खिलौनों से जीवन तक 10932 0 Hindi :: हिंदी
लेकर निकला था खिलौनें का पहिया, साफ़-सुथरे रास्तों पर। क्या पता था — जीवन का पहिया कीचड़ और दलदल रौंदकर ही आगे बढ़ता है। बचपन में, हर मोड़ पर मेले थे, हर आकाश रंगीन था। फिर… राहों में पत्थर आए, ठोकरें आईं, और उम्मीद… कई बार खो गई। तब जाना — राह खुद बनानी पड़ती है। कीचड़ में भी सूरज छुपा होता है, बस आँखें चाहिए, देखने की हिम्मत चाहिए। अब खिलौने नहीं, सिर्फ़ सपने हैं मेरे हाथ में। और वो बच्चा… अभी भी मेरे दिल में खेल रहा है। क्योंकि असली जीत… मेहनत और साफ़ दिल वालों की होती है।