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कर्ज पर कविता

Rambriksh Bahadurpuri 24 Oct 2024 कविताएँ समाजिक #Rambriksh Bahadurpuri #Karj per kavita #Ambedkar Nagar poetry, 43955 0 Hindi :: हिंदी

कर्ज 

पुस्तैनी जमीन 
का बटवारा,
ऊंची हवेली 
घर मकान 
का बटवारा,
मां के हाथ,नाक 
कान गले पांव 
के आभूषण
का बटवारा,
लहलहाते फसलों 
से भरे खेत 
का बटवारा,
तैयार है हर कोई 
अपने हिस्से के लिए। 

क्यों नहीं?
कोई तैयार है 
बांटने को 
पिता का दर्द,
पीड़ा,
दु:ख,और
कष्ट,
बैठ कर पास 
एक भी पल। 
इतना बदलाव क्यों?
वर्षों की आशा पर
इतना धाव क्यों?

क्या अब नहीं रहा ?
पुत्र पर 
पिता का कर्ज,
पिता के कर्तव्य पर 
पुत्र का फर्ज,
पिता मानों खुद 
उतार रहा है कर्ज 
देकर अपना -
जमीन,
ज़मीर,
धन,और 
जागीर 
लेटे लेटे चिंता के चिता पर। 


        रचनाकार 
    रामबृक्ष बहादुरपुरी 
अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश

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