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कहां वो जाते होगे

Bholenath sharma 02 Jun 2024 कविताएँ समाजिक कहाँ वो जाते होगे 59931 0 Hindi :: हिंदी

सुबह सुबह निकल पड़ते है।                       दिन ढलने पर आते है।                             बढ़ते तापो मे                                  इतनी गर्मी में                                      कहाँ वो जाते होगे                                 पेटों के खतिर                                  पैसों के खातिर                                     कहाँ वो जाते होगें                                   श्रम करना पड़ता है                                ऋतुओं का फर्क न पड़ता है                          कहाँ वें , क्या करते होगे ।                      रहते है प्रदेशो में                                           दूर परिवारो से                                        पैसो के खतिर                                           वहाँ वे जाते होंगे                                   कोई शौक नहीं हम को                  मजबूरी है हमारी                                  नाम है शहर में रहते                              किसी तरह हम जीते होगें।                         यह स्वयं जानते हैं

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