Raj Ashok 09 Feb 2025 कविताएँ हास्य-व्यंग झूरीया 24698 0 Hindi :: हिंदी
उन्हें लब्ज़ नहीं मिले , वो क्या अपनी व्यथा सुनाते ।। बस एक टक नज़र से निहारते रहे।। क्यो ? ख्वाईशौं के सिकन्दर आज, ज़िन्दगी को बोझ समझते हैं।। क्या ऐसा हुआ ।। जो हार मान गए.......। ये चोट है ।। जो दिल के ज़ख्म छुपाती है ।। बस चहरे की सिकुड़ती झूरीया सब बताती है ।। नादानियां अच्छी थी।। पर अब हमें कौन माफ करें बदल ने दे लोगों को