Raj Ashok 27 Apr 2023 कविताएँ हास्य-व्यंग इश्क ओर मुशक 30815 0 Hindi :: हिंदी
छोड़ चुके थे। अब
शाही अन्दाज़ मे जीना ।
नजाने ऐसा क्या बदला ?
के आईने को आइना
दिखाने मे लगे थे।
जैसे, सब एक सच को
छुपाने मे लगे थे।
अपने बेचैन दिल से हारे।
थे, सब नशीब का मारे
लगे थे ।तकदीर ,
का लिखा मिटाने ।
पर जहाँ मे होता वही है।
जो मंजुरे खुदा होता है।
आ ही, जाता है। सच जुबा पे
चाहे रखो इस, जीतने पर्दो मे
कभी नजर कह जाती है।
तो कभी घड़कन
नजाने क्यो, ये दुनियाँ
कोई, राज नहीं छुपा सकती ।
इसीलिए तो कहते है ।
कभी इश्क़ और मुशक कभी
छुपाऐ नहीं । छुपते ......?