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होली (कटाक्ष)

AJAY KUMAR JOSHI 04 Mar 2025 कविताएँ समाजिक होली, रंग, हास्य, व्यंग्य, कटाक्ष, अध्यात्म 24715 0 Hindi :: हिंदी

होली यारों मैं क्यों खेलूं
सब पर फरेब  मुखोंटे हे |
किसी के दिल में केसे बसु में 
सब के दिल बहुत छोटे हैं ||
इस रंग बदलती दुनियां में 
एक रंग कहा चढ़ पाता है|                           एक रंग -( प्यार का रंग जो सबा एक सा रहता हे )
गिरगिट जैसी बिसात हे सबकी 
वो पल पल रंग बदलता जाता हे 
 AJAY ALWAYAS :- सत्य की खोज में

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