akhilesh Shrivastava 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक इस कविता में मैंने उन बच्चों की मनःस्थिति को कविता के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास किया है जो बच्चे अपने घर से बाहर पढ़ाई करने या नौकरी करने बाहर जाते हैं 49773 0 Hindi :: हिंदी
*घर की याद सताती है* घर से बाहर हमें पढ़ाई या नौकरी ले जाती है घर के लोगों से ये दूरी हमें कभी नहीं भाती है।। पापा -मम्मी हमें आपकी याद बहुत आती है कभी कभी रातों में हमें नींद नहीं आती है ।। रोज सबेरे जल्दी उठकर हम ही चाय बनाते हैं और नाश्ता करके हम कालेज/आफिस को जाते हैं अपनों का आशीष लिए हम अपने रूम से जाते हैं जाकर अपने काम में पापा फिर हम रम जाते हैं। दोपहर का खाना मां हम कैंटीन में खाते हैं शाम को भारी मन से मां हम अपने रूम में आते हैं। रूम का सूनापन मां पापा हमको बहुत सताता है अपनों को पास न पाकर मां ये मन घबराता है।। ग़लती पर अब! मुझे टोकने मां तुम पास नहीं होती इसीलिए तो मुझसे मां अब गलती कोई नहीं होती। रात डिनर पर आप सभी की याद बहुत आती है भूख हमारी खाने के पहले ही मर जाती है।। कभी कभी तो मां रातों में नींद नहीं आती है मां की गोदी सर रखने जब हमें नहीं मिल पाती है। मां पापा उज्जवल भविष्य इच्छा से हम आये हैं घर से बाहर हम बच्चे *कुलदीपक* बनने आये हैं। घर से बाहर हमें पढ़ाई या नौकरी ले जाती है पापा मम्मी हमें घर की याद बहुत सताती है।। रचयिता -अखिलेश श्रीवास्तव जबलपुर
I am Advocate at jabalpur Madhaya Pradesh. I am interested in sahity and culture and also writing k...